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... झोपड़ी न कहिए हुजूर ये गरीबों के आशियाने थे

Bulandshahr

Updated Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
आगजनी से 125 परिवार बेघर, 10 मवेशी मरे, छह झुलसे
खुर्जा। पानी नहीं बहा ये आंसुओं का खजाना था, झोंपड़ी न कहिए हुजूर ये गरीबों का आशियाना था। अज्ञात शायर की यह पंक्तियां शनिवार रात गांव रोहिंदा के नगला बंजारा में हुए अग्निकांड में जले गरीबों के आशियाने और अफसरों के बयान पर चरितार्थ हो रही है। आगजनी में लगभग एक सौ पच्चीस परिवार बेघर हो गए और लाखों की नगदी-जेवर, कीमती सामान और मवेशी जलकर राख हो गए। रविवार सुबह तक ग्रामीणोें के दस मवेशियों की मौत हो चुकी थी और छह ग्रामीण आग की चपेट मेें आकर झुलसे। अफसर पूछने पर गांव में कुछ झोंपड़ियां जलने का बयान देते रहे हैं।


चार की डोली पर लगा ग्रहण
खुर्जा। नगला बंजारा में हुई आगजनी ने गांव की चार युवतियों की डोली पर ग्रहण लगा दिया है। पंद्रह दिन में गांव की चार युवतियों की शादी होनी है और उनके घर और दहेज का सामान जलकर राख हो गया। वहीं एक नवविवाहिता का दहेज का सामान भी स्वाहा हो गया। चांदी के जेवरात के शौकीन बंजारों के लाखों रुपये के जेवर भी राख के ढेर में मिल गए। गांव निवासी मुन्ना के परिजनों को रविवार की सुबह रोकर बुरा हाल है। मुन्ना ने बताया कि 26 तारीख को उसकी दो पुत्रियों का निकाह है। उसने पुत्रियों के निकाह का कई माह से बंदोबस्त शुरू किया। दहेज के लिए सामान खरीद कर घर में रखा । आगजनी ने मुन्ना की दोनों पुत्रियों के अरमानों पर कुठाराघात कर दिया। उधर, गांव के दीन मोहम्मद की दो पुत्रियों की 28 तारीख को बारात आनी थी। उसने भी पुत्रियों को देने को काफी सामान खरीदकर झोंपड़ी में रखा था। आगजनी मेें उनका सारा सामान जल गया। गांव के कमालुद्दीन का एक माह पहले ही निकाह हुआ। उसकी पत्नी का सारा सामान जल कर राख में तब्दील हो गया।


आशियाने सुलगते रहे, लोग सिसकते रहे
खुर्जा। चूल्हे की चिंगारी से लगी आग ने शनिवार शाम रोहिंदा के नगला बंजारा के सवा सौ लोगों की झोंपड़ियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। फायर बिग्रेड और बारिश का पानी आग पर काबू पाने में नाकाम साबित हुआ था। देर रात बंजारों के आशियाने आग में सुलगते रहे और लोग आंसू बहाकर सिसकते रहे। जिस भी झोंपड़ी को आग ने अपनी गिरफ्त मेें लिया, तब तक शांत नहीं हुई जब तक सब कुछ राख नहीं हो गया। रात एक बजे तक दमकल विभाग ने आग पर काबू तो पा लिया, लेकिन तब तक दर्जनों गरीबों की दुनिया उजड़ चुकी थी। हालांकि रविवार सुबह तक इक्का-दुक्का झोंपड़ियों में आग की लपटें और धुआं निकलता दिखाई दे रहा था।

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