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मालागढ़ किले से हुई थी प्रथम क्रांति की शुरुआत

Bulandshahr

Updated Thu, 10 May 2012 12:00 PM IST
औरंगाबाद। आज क्रांति दिवस है। शायद जनपद के कुछ ही लोगों को इस बात का पता होगा कि यहां प्रथम क्रांति की शुरुआत छोटे से गांव माला गढ़ के किले से हुई थी। इस किले में अंग्रेजों के दांत खट्टे करने के लिए सैनिक तैयार किए जाते थे और फिर उन्हें लोहा लेने के लिए मोर्चे पर भेजा जाता था। अंग्रेजों ने तोप से इस किले को धराशायी कर दिया। आज भी यह किला मिट्टी के टीले की तरह खंडहर बना है, इसकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं है। देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वालों की शहादत भी आज उपेक्षा के चलते गुम हो गई है।
बुलंदशहर जनपद से छह किमी दूर अगौता के गांव माला गढ़ का ऐतिहासिक टीला बागों से घिरा है। यहीं पर नवाब वलीदाद खां का जन्म हुआ था। उस समय बादशाह वलीदाद खां माला गढ़ मंडी पर अपना किला बनाना चाहते थे, लेकिन किले की दीवार दिन में बनाई जाती तो रात में गिरा दी जाती थी। उस समय अंग्रेजों की गुलामी के दंश में हर हिंदुस्तानी करार रहा था। नवाब वलीदाद के नेतृत्व में इस किले में अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय सैनिक तैयार किए जाने लगे। दिन में सैनिकों को तैयार किया जाता और रात के समय उन्हें दुश्मनों के दांत खट्टे करने के लिए मोर्चे पर भेज दिया जाता। माला गढ़ किले के बारे में यह भी बताया जाता है कि बुलंदशहर जिले में प्रथम क्रांति की शुरुआत ही इस किले से हुई थी। दुश्मनों की हर स्थिति से निपटने के लिए इस किले में हर वक्त भारी मात्रा में गोला बारूद भी रखा रहता था। एक दिन अंग्रेजों ने तोप के गोले से वार कर माला गढ़ किले को ही धराशायी कर दिया। तब से आज तक यह किला खंडहर बना हुआ है। निशानी के तौर पर किले की कुछ पुरानी दीवारें और एक कुआं आज भी है। अब गांववाले इस धराशायी किले के टीले पर उपले पाथने लगे हैं। सुबह-शाम गांव के पशु यहां चरने के लिए भी आते हैं। कोई प्रशासनिक पहरा नहीं होने से माला गढ़ का किला दिन-प्रतिदिन उपेक्षा का शिकार होता जा रहा है।
जिला प्रशासन को चाहिए कि जनपद की ऐतिहासिक धरोहर के रूप में विकसित कर माला गढ़ किले के शेष बचे खंडहर को बचाया जाए। इसके लिए आमजन के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों को भी पहल करनी होगी।
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