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व्यवसायीकरण की दौड़ में भूल रहे कर्तव्य

Bijnor

Updated Sun, 01 Jul 2012 12:00 PM IST
बिजनौर। चिकित्सक भगवान का दूसरा रूप होता है, लेकिन पिछले कुछ समय से व्यवसायीकरण की अंधी दौड़ में चिकित्सकाें के अंदर समाज सेवा की भावना कुंद होती जा रही है। इस संदर्भ में डॉक्टरों को उनके कर्तव्यों से रूबरू कराने और उनकी सेवा भावना को बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल एक जुलाई को चिकित्सक दिवस के रूप में मनाते हैं।
जिले भर में सरकारी तौर पर 218 पदों के सापेक्ष केवल 69 चिकित्सक ही तैनात हैं। संविदा पर भी कोई चिकित्सक जिला अस्पताल को ढूंढा नहीं मिल रहा है। देहात क्षेत्रों में बनी पीएचसी व सीएचसी पर भी बुरा हाल है। जिले में 11 पीएचसी व ग्यारह सीएचसी है और 45 एडिशनल सीएचसी है। देहात क्षेत्रों की ज्यादातर सीएसची फार्मेसिस्ट के भरोसे चल रही है। मुख्यालय से दूर सीएचसी व पीएचसी पर हाल ही में 14 चिकित्सकों को तैनाती दी गई, मगर सभी चिकित्सक देहात क्षेत्रों में जाने से पल्ला झाड़ रहे हैं। देहात क्षेत्रों के प्रति ऐसे माहौल में इन चिकित्सकों को आइना दिखाते हुए कई प्राइवेट चिकित्सक ऐसे भी हैं, जिन्होंने चिकित्सक कर्त्तव्य व मानवता को सिद्ध किया है। कैरियर की परवाह न करते हुए ये चिकित्सक अच्छी डिग्री लेने के बाद देहात क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाएं दे रहे हैं।
केस नंबर एक
जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर रतनगढ़ उर्फ आजमपुर गांव निवासी डा. रामप्रकाश त्यागी हृदयरोग विशेषज्ञ हैं। एमबीबीएस के बाद एमडी इन्हाेंने वर्ष 1985 में की। इसके बाद मेरठ के दीनदयाल उपाध्याय हॉस्पिटल में वर्ष 1986 से 89 तक जॉब किया। इसके बाद डा. रामप्रकाश त्यागी ने नौकरी छोड़ दी और अपने पैतृक गांव रतनगढ़ में क्लीनिक शुरू किया। उन्होंने गांव के लोगों की पीड़ा को समझा। डा. रामप्रकाश त्यागी का कहना है कि उन्हें अपने गांव से बेहद लगाव है। गांव का कोई भी व्यक्ति बीमार हो जाता था तो अच्छी चिकित्सा सुविधा के लिए उन्हें बिजनौर या फिर अमरोहा जाना पड़ता था। अब शहर के मरीज भी उनके पास इलाज के लिए आते हैं। डा. त्यागी कहते हैं कि गांव में मरीजों को चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराकर उन्होंने चिकित्सक कर्त्तव्य का पालन किया है।
केस नंबर दो
धारुवाला मंडावली के डा. कैलाश चंद्र ने वर्ष 1977 में कानपुर विश्वविद्यालय से बीएएमएस की डिग्री ली। वर्ष 1978 में डा. कैलाश चंद्र मेरठ में संक्र ामक रोग अधिकारी के पद पर नियुक्त हुए। गांव से अधिक लगाव होने के कारण एक साल बाद ही नौकरी छोड़ दी और गांव में क्लिनिक खोला और अकेले मंडावली ही नहीं बल्कि आसपास के करीब 40 से भी अधिक गांवों के लोगों के लिए वरदान बन गए। पहले लोग बीमार होने पर बिजनौर आते थे, गांव में प्राथमिक उपचार के लिए भी कोई चिकित्सक नहीं था। खास बात यह है कि डा. कैलाश चंद्र मरीजों से फीस नहीं लेते हैं, केवल दवा के पैसे ही लेतेे हैं। उनका एक भाई व दो लड़के भी एमबीबीएस हैं और सरकारी जॉब कर रहे हैं। डा. कैलाश चंद्र का कहना है कि गांव से दूर उनसे नहीं रहा जाता है। मरीजों की सेवा में ही उन्हें सुख मिलता है। इनके अलावा कई और चिकित्सक भी मानवता के इस मिशन में जुटे हुए हैं।
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