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देश ने आतंकवाद को सबक सिखाया

Bhadohi

Updated Thu, 22 Nov 2012 12:00 PM IST
ज्ञानपुर। आतंकवादी आमिर अजमल कसाब को फांसी देने का सभी वर्गों ने तहे दिल से स्वागत किया है। बुधवार को बातचीत में जिले के अधिवक्ता, समाजसेवी और राजनीतिज्ञों के अलावा अन्य लोगों के जो विचार छलक कर बाहर आए, उसका निचोड़ यही रहा कि देश ने नासूर बनती जा रही आतंकवाद की बीमारी के उचित इलाज की दिशा में अब कारगर कदम उठाया है। लोगों ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के महीनेभर के अंदर फांसी दे देनी चाहिए थी। देर से ही सही, लेकिन फैसला दुरुस्त हुआ।
वरिष्ठ अधिवक्ता तेज बहादुर यादव ने कहा कि कसाब को फांसी उचित और वैधानिक निर्णय है। ऐसी सजा मिले तो देश के खिलाफ कदम उठाने वाले आतंकवादियों और अपराधियों के हौसले पस्त होंगे। संसद हमले के आरोपी अफजल गुरु को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद फांसी देने में हो रही देरी पर उन्होंने नाराजगी जताई। कहा कि देश का सर्वोच्च न्यायालय जिस व्यक्ति को फांसी की सजा सुना चुका है, उस पर सियासत नहीं की जानी चाहिए। केएनपीजी के प्रवक्ता डा. भारतेंदु द्विवेदी ने कहा कि कसाब को फांसी देने के पीछे बेहतर यह है कि 26 नवंबर के पूर्व यह फैसला ले लिया गया है। इससे 2008 में आतंकी घटना में शहीद हुए लोगों के परिजनों को थोड़ी राहत मिलेगी। माजिद खां ने कहा कि सरकार के लचर रवैए के चलते आतंकवादी गतिविधियां बढ़ जातीं हैं। ऐसे अपराधियों को कम समय में सजा दे देनी चाहिए, ताकि देश के बाहर से होने वाली गतिविधियां दब जाएं। अधिवक्ता शमशाद खान ने कहा कि आतंकवाद देश के लिए नासूर बन चुका है। आतंकवादी और उनके खिलाफ होने वाले निर्णय त्वरित हों तो बात बने। निर्णय त्वरित होंगे तो ऐसे लोगों के अंदर भय पैदा होगा। कसाब को फांसी और पहले ही दे दी जानी चाहिए थी। केबिल आपरेटर संघ के जिलाध्यक्ष कोको दुबे ने कहा कि पेड़ के एक पत्ते को तोड़कर फेंक देना ही काफी नहीं है। आतंकवाद के पेड़ को जड़ से उखाड़ना होगा। भिडिउरा निवासी प्रमोद दुबे ने कानूनी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि एक आतंकी को चार साल तक जेल में बैठाकर उस पर लाखों रुपये खर्च करना कहां तक उचित है। ऐसे दोषी को तुरंत सजा देने में अगर पेच फंस रहा है तो फिर संवैधानिक व्यवस्था में संशोधन की जरूरत है।
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