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मिलों पर फंसा चार अरब रुपये का चावल

Basti

Updated Thu, 27 Dec 2012 05:30 AM IST
बस्ती। राइस मिलों को धान कूटना देना विभाग के लिए भारी पड़ रहा है। मंडल में लगभग चार अरब रुपये का सरकारी चावल मिलों पर बकाया है। विभाग आठ महीने बाद भी मिलों से चावल नहीं वसूल सका। वर्ष 2011-12 का लगभग 2.90 लाख क्विंटल चावल दो सौ मिलों पर बकाया है। सबसे अधिक खाद्य विभाग से संबंधित 166 मिलों पर 2.37 लाख क्विंटल सीएमआर बकाया है। वहीं चावल देने की सीमा समाप्त होने में मात्र पांच दिन बाकी है, मगर अब तक राइस मिलों ने चावल ही नहीं दिया है। चर्चा है कि अधिकतर मिलों ने चावल का या तो व्यापार कर लिया या फिर उनके यहां पड़े-पडे़ खराब हो गया। विभाग बकाएदार मिलों को चावल की डिलिवरी के लिए अंतिम नोटिस भेज रहा है। साथ ही समय सीमा बीतने के बाद कानूनी प्रक्रिया शुरू करने की बात अफसर कह रहे हैं।
सरकार और खाद्य विभाग के लिए वर्ष 2011-12 का बकाए चावल राइस मिलों से वसूलना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। विभागीय अभिलेखों के मुताबिक, खाद्य विभाग से संबंधित राइस मिलों पर 182430 क्विंटल, पीसाएफ पर 60810 क्विंटल, यूपी एग्रो पर 17470 क्विंटल, यूपीएसएस पर 23360 क्विंटल, राज्य कर्मचारी कल्याण निगम पर 5940 क्विंटल और नेफेड पर 380 क्विंटल सीएमआर बकाया है। मिलर संघ के मंडलीय अध्यक्ष जेपी सिंह ने बताया कि एफसीआई के चावल रिजेक्ट कर देने से चावल बकाया रह गया। एफसीआई के क्षेत्रीय प्रबंधक एसएन सिंह कहते हैं जो चावल मानक के अनुसार नहीं था, उसे ही रिजेक्ट किया गया। आरएफसी एके सिंह ने चावल न जमा होने के पीछे एफसीआई का कड़ा मानक और हठधर्मिता बताया। जब चावल समय से नहीं जमा हो पाया तो सरकार ने चावल जमा करने की सीमा 31 दिसंबर तक बढ़ा दी। उसके बाद अधिकारियों को चावल गबन के आरोप में मुकदमा दायर करने कर फरमान जारी कर दिया। नियमत: 20 दिनों के भीतर धान का चावल जमा करने का प्रावधान है। आरएफसी कहते हैं कि मिलर किसी भी असुविधा और कार्रवाई से बचने के लिए पुराना सीएमआर 31 दिसंबर तक जमा कर दें। बताया कि इस संबंध में बकाएदार मिलों को अंतिम नोटिस भेजा जा रहा है।

सरकारी चावल का कर लिया व्यापार
मिलों पर बकाए चावल की हकीकत जानने के लिए हुई जांच में पता चला कि अधिकतर मिलों से चावल ही नदारद है। कहते हैं कि इसमें अधिकतर मिलों ने चावल का व्यापार कर लिया, वहीं ऐसी भी चर्चा है कि इनमें कुछ ने तो सरकारी चावल से जमीन खरीद ली और कुछ ने मकान तक बना लिये। हालांकि मिलर संघ ने इन आरोपों को खारिज किया है। कुछ ऐसी बकाएदार मिलें भी हैं जो चावल देना तो चाहती हैं और उनके पास चावल भी है, मगर चावल की गुणवत्ता खराब होने के चलते वह दे नहीं पा रही हैं।
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