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भयावह होते जा रहे एक्सिडेंट में मौत के आंकड़े

Basti

Updated Thu, 01 Nov 2012 12:00 PM IST
बस्ती। फोरलेन सड़कों और लग्जरी वाहनों ने समय को बेशक काफी कम कर दिया है। मगर अंजाम भयावह होते जा रहे हैं। आंकडे़ गवाह हैं कि रफ्तार की मार जानलेवा होता जा रहा है। इसी साल तीन सौ दिनों में 170 रोड एक्सिडेंट हुए, जिनमें 110 की मौत हो चुकी है। 90 लोग घायल हुए हैं। इनमें 15 ऐसे हैं, जो उम्र भर के लिए विकलांग हो गए। गुरुवार से यातायात सुरक्षा माह शुरू होने जा रहा है।
विक्रमजोत के रमघटिया की घटना अभी भूली नहीं होगी, जिसमें शहर के रौतापार निवासी तीन सगे भाइयों की एक झटके में जान चली गई थी। सड़क सुरक्षा सप्ताह में इस पर भी गौर करना होगा। ऐसी घटनाएं औसतन हर तीसरे दिन हो रही हैं। सीओ ट्रैफिक राजेश भारती के मुताबिक, इस बार एक पखवारे का विशेष चेकिंग अभियान शुरू किया जा रहा है। इसमें लाल-नीली बत्ती, सायरन-हूटर, हेलमेट आदि की चेकिंग की जाएगी।
कोहरे में सतर्क रहने की जरूरत
कोहरे और धुंध का सीजन आने वाला है। ऐसे में और भी सतर्क रहने की जरूरत है। आंकडे़ बताते हैं कि सड़क पर होने वाली दुर्घटनाओं में तीस फीसदी घटनाएं कोहरे की वजह से होती हैं। सीओ ट्रैफिक राजेश भारती के मुताबिक, कोहरे में वाहन चलाते समय खास ध्यान रखना होगा।
खुद संभलें तभी सुखद होगी यात्रा
वाहनों की भेंड़चाल के बीच खुद को सुरक्षित निकाल ले गए तो समझो किस्मत अच्छी है। वरना कोई ठिकाना नहीं कि कब कौन सामने से बहकते हुए आए और पल भर में जीवन भर का दर्द देकर चला जाएगा। सीओ ट्रैफिक राजेश भारती का कहना है कि लोग खुद अपने को सेफ करके चलें तो ही सुरक्षा हो सकती है।
‘होश’ वाले भी होते हैं बेकाब्रू
एक्सिडेंट होने पर तुरंत शक होता है कि ड्राइविंग करने वाला ड्रिंक किया होगा। ऐसा बहुतायत होता भी है मगर हकीकत यह है कि नशे में ही नहीं बल्कि बिना नशा वाले भी कभी-कभी जोश में होश खो बैठते हैं। हाल की अधिकतर घटनाओं में इक्का-दुक्का को छोड़कर बाकी चालक नशे में नहीं थे। मगर सबने जोश में होश खोया और अंजाम में कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा।
कम हो सकती हैं एक्सीडेंट में मौतें
एक्सिडेंट में सबसे अधिक मौतें इसलिए हो जाती हैं क्योंकि सही समय पर सही इलाज नहीं मिल पाता। घायल को किसी तरह अस्पताल पहुंच भी गया तो पुख्ता इलाज के अभाव में वह दम तोड़ देता है। सबसे दुखद पहलू यह है कि ऐसे समय में जिला अस्पताल से घायल को रेफर कर दिया जाता है, जब उसकी हालत बेहद नाजुक होती है। उस वक्त घायल के पास डाक्टर का होना बेहद जरूरी होता है मगर उसे खटारा एंबुलेंस में हिचकोले खाने के लिए छोड़ दिया जाता है। अक्सर सुनने में आता है कि लखनऊ या गोरखपुर मेडिकल कालेज ले जाते समय मौत हो गई।
ट्रामा सेंटर बनने के बाद कम हाेंगी मौतें
काफी जद्दोजहद के बाद ट्रामा सेंटर का निर्माण शुरू हो गया है। उम्मीद है कि साल भर के भीतर काम पूरा हो जाएगा। यूपीपीसीएल कंपनी को ट्रामा सेंटर विकसित करने का ठेका मिला है। सीएमओ डाक्टर राजेंद्र कुमार के मुताबिक, ट्रामा सेंटर विकसित हो जाने के बाद गंभीर घायलों का भी इलाज हो सकेगा। अभी उन्हें लखनऊ या गोरखपुर मेडिकल कालेज रेफर करना पड़ता है।
कहां गया सड़क सुरक्षा अभियान का असर
पुलिस और परिवहन विभाग सड़क सुरक्षा के नाम पर अभियान चलाता है। बच्चों से बड़ों तक को जागरूक और सतर्क रहने के लिए प्रेरित करता रहता है। ट्रैफिक के नियमों की बारीकियां बताई जाती हैं, मगर उसका असर शायद ही देखने को मिलता। डीआईजी वीपी सिंह का मानना है कि यह ऐसा मुद्दा है, जिसमें लोगों को स्वयं पहल करनी पड़ेगी। उन्हें अपनी जिंदगी खुद सुरक्षित रखने के लिए गंभीर होना पडे़गा। पुलिस और परिवहन विभाग केवल सतर्क कर सकता है पर स्टियरिंग तो आपके ही हाथ होगी।
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