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बेसहारों का सहारा नहीं बन पाएंगे शेल्टर होम

Bareilly

Updated Fri, 07 Dec 2012 05:30 AM IST

अजय सक्सेना
बरेली। डेढ़ करोड़ रुपये खर्च करके बनाए गए शेल्टर होम कतई उपयोगी साबित नहीं हो रहे हैं। बिजली-पानी का कनेक्शन न होने की वजह से ये रहने लायक ही नहीं रह गए हैं। नगर निगम की लापरवाही की वजह से सारा धन पानी में बहता दिख रहा है। यही कारण है कि तेज हुई सर्दी में आश्रयहीन लोग खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर हैं।
शेल्टर होम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनाए गए थे। सन् 2010 में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद इस आदेश को और कड़ाई से लागू किया गया। अयूब खां चौराहा पर तो पहले से शेल्टर होम चल रहा था, बाकी सात और बनाए गए। इनमें से तीन का निर्माण कार्य तो पिछले साल कड़क जाड़ों में भी चलता रहा। बाकी चार में कोई इसलिए जाकर नहीं रुका, क्योंकि रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड या फिर शहर के प्रमुख स्थानों से काफी दूर बने हैं। दो तो हजियापुर में बनाए गए हैं। इसके अलावा छोटी विहार, सैदपुर हाकिंस, बाकरगंज, सीआई पार्क के पास, बाकरगंज और बदायूं रोड पर सुभाषनगर मोड़ के पास पानी की टंकी के सामने एक-एक शेल्टर होम बनाए गए हैं।

बिजली-पानी ही नहीं
सात शेल्टर होम में से किसी में भी अब तक बिजली का कनेक्शन नहीं हुआ है। पूर्व नगर आयुक्त अबरार अहमद ने प्रकाश विभाग को इनमें बिजली कनेक्शन कराने को कहा था, मगर कनेक्शन नहीं लिया गया। अब इन शेल्टर होम में बिना बिजली के भला कौन ठहरेगा। पानी के कनेक्शन भी पांच शेल्टर होम में नहीं हो सके हैं। सिर्फ बाकरगंज और सीआई पार्क के शेल्टर होम में ही ये कनेक्शन हैं। हजियापुर के दोनों शेल्टर होम और सैदपुर हाकिंस के शेल्टर होम में सबमर्सिबल लगाए गए हैं, मगर इन्हें चलाने के लिए बिजली ही नहीं है। छोटी विहार में हैंडपंप में ही मोटर जोड़ दिया गया है, मगर वह भी बिजली न होने की वजह से नहीं चल पाता। बदायूं रोड के शेल्टर होम के सामने ही ओवरहेड टैंक है, मगर अब तक कनेक्शन नहीं जोड़ा गया है। जलकल विभाग के प्रभारी एई एबी राजपूत का कहना है कि जब यह चालू होगा तो कनेक्शन करा देंगे, वरना लोग टोटियां खोलकर ले जाएंगे।

चौकीदारों के हवाले हैं सब
किसी भी शेल्टर होम पर केयर टेकर की व्यवस्था नहीं है। सिर्फ चौकीदारों के हवाले छोड़ दिया गया है। शुभम सिक्योरिटी एजेंसी के माध्यम से ये चौकीदार तीन-तीन हजार रुपये पर रखे गए हैं। सीआई पार्क वाले शेल्टर होम में तो चौकीदार परिवार के साथ रहता है। एक शेल्टर होम में तो चौकीदार अंदर बैठने के बजाए पास में ही पान की दुकान चलाता है। ऐसे में यदि कोई यहां ठहरने भी आए तो ताला देखकर लौट जाएगा। सही बात तो यह है कि किसी शेल्टर होम को चौकीदार लावारिस छोड़कर चले जाते हैं तो किसी पर ताला ही डाले रखते हैं। यही नहीं वे इनमें बाराती भी ठहरा लेते हैं। सभी में तख्त और बिस्तर होने का भी वे फायदा उठाते हैं। पड़ताल के वक्त एक शेल्टर होम के चौकीदार से जब इस बारे में बात की गई तो उसने यहां तक कहा कि नगर निगम में जाकर बात कर लीजिए, वहीं से हमें आर्डर मिलता है।

लैटरीन-बाथरूम इस्तेमाल लायक नहीं
सभी सातों शेल्टर होम के लैटरीन और बाथरूम इस्तेमाल लायक नहीं बचे हैं। बंद पड़े रहने के कारण इनमें कूड़ा जम गया है। इन्हें बनने के बाद से कभी साफ नहीं किया गया। इनमें से दो शेल्टर होम ऐसे भी हैं, जिनका इस्तेमाल आसपास रहने वाले लोग करते हैं। इनकी साफ-सफाई के लिए निगम के कर्मचारी कभी वहां नहीं जाते।

147 लाख खर्च हुए
एक शेल्टर होम के निर्माण में 21 लाख रुपये खर्च हुए। कुल मिलाकर 147 लाख रुपये इन पर खर्च हुए। इसमें से 70 प्रतिशत रकम राज्य सरकार की थी तो 20 प्रतिशत अवस्थापना निधि से खर्च की गई और दस प्रतिशत नगर निगम निधि से मिलाई गई।

अस्थायी शेल्टर होम लगना मुश्किल
पिछले साल काफी हाय-तौबा के बाद चौपुला, शहामतगंज और सैटेलाइट बस स्टैंड के पास अस्थायी शेल्टर होम बनाए गए थे। तब नगर निगम इन्हें बनाने के लिए तैयार नहीं था। अफसरों का तर्क था कि जब पक्के शेल्टर होम बन गए हैं तो इन पर खर्चा नहीं किया जा सकता। वहीं पाया यह गया था कि पूरी तरह से तैयार न होने के कारण ये रहने लायक नहीं हैं। इस बार अस्थायी शेल्टर होम बनाने का अब तक कोई इरादा सामने नहीं आया है। ऐसे में लोगों को फिर खुले आसमान के नीचे रहना मजबूरी होगी, या फिर दुपी-छुपी जगह बने पक्के शेल्टर होम में परेशानियों को झेलते हुए रुकें।

अलाव में फिर देरी
अलाव की लकड़ी के लिए अभी तक टेंडर नहीं हो सके हैं। पांच दिन पहले जब मेयर ने इस बारे में अफसरों से पूछा तो सब एक-दूसरे की बगले झांकने लगे थे। पिछले दो साल से लगातार ऐसा हो रहा है कि कड़क सर्दी शुरू होने पर ही अफरा-तफरी के बीच टेंडर के बजाए सीधे टाल से लकड़ी खरीदी गई। इसमें फालतू खर्चा भी हुआ था। साथ ही लोगों को अलाव भी देर से नसीब हो पाए थे।
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