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रानीखेत के नाम पर अंग्रेजों ने दिया यह कैसा कलंक

Bareilly

Updated Mon, 26 Nov 2012 12:00 PM IST

हल्द्वानी। पहाड़ के जिस शहर की खूबसूरती का नजारा देखने लोग देश-विदेश से आते हैं, उसी के नाम पर ब्रिटिशों ने 65 साल पहले जो कलंक लगाया था, वह आज तक बरकरार है। उत्तराखंड में रानीखेत एक मशहूर पर्यटन स्थल है। जबकि यह सच्चाई जानकर ताज्जुब होगा कि पक्षियों में वायरस से फैलने वाले एक रोग का नाम भी ‘रानीखेत’ है। यह बीमारी मुर्गियों, मोर और बत्तखों में फैलती है। हालांकि रानीखेत शहर से इस बीमारी का कोई लेना देना नहीं है। अंग्रेजों ने साजिश के तहत बीमारी का नाम न्यू कैसल से बदलकर रानीखेत रख दिया था। ग्रेटर नोएडा के कुछ गांवों में चार माह पहले इसी रोग के फैलने की खबर के बाद एक आरटीआई कार्यकर्ता ने भारत सरकार से इसकी जानकारी मांगते हुए इस महामारी का नाम बदलने की मांग की है।
रानीखेत बीमारी का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। इस रोग के वायरस ‘पैरामाइक्सो’ को सबसे पहले वैज्ञानिकों ने वर्ष 1926 में इंग्लैंड के न्यू कैसल शहर में चिन्हित किया था। दुनिया में अब भी इसे न्यू कैसल रोग ही कहा जाता है, लेकिन हिंदुस्तान में बीमारी का नाम ‘रानीखेत’ है। इसकी वजह यह कि वर्ष 1928 में रानीखेत में मुर्गियों पर न्यू कैसल रोग महामारी की तरह फैल गया था। इसकी पुष्टि के बाद ब्रिटिश विज्ञानियों ने चतुराई से हिंदुस्तान में इसी राष्ट्र के सुंदर शहर के नाम पर बीमारी का नाम परिवर्तित कर रानीखेत रख दिया। ताकि कम से कम भारत में इंगलैंड का न्यू कैसल शहर बदनाम न हो। यही दुर्भाग्य है कि, अब भी हिंदुस्तान में जहां भी वायरस फैलता है, वहां इसे ‘रानीखेत’ ही कहा जाता है। उत्तर भारत में इस रोग का फैलाव कम है, पर दक्षिण और पश्चिम भारत में कई बार बीमारी मुर्गियों की जान को महामारी की तरह निगलती है।
रोग उभरने पर यदि तुरंत ‘रानीखेत एफ-वन’ नामक वैक्सीन दी जाए तो 24 से 48 घंटे में पक्षी की हालत सुधरने लगती है। ग्रेटर नोएडा के गांवों में मोरों पर रानीखेत रोग के फैलने की सूचना पर सितंबर में दिल्ली में पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेड और मूल रूप से उत्तराखंड के मासी गांव निवासी सतीश जोशी ने सूचना के अधिकार के तहत भारत सरकार के पशुपालन, डेयरी और मछली पालन विभाग से इसके बारे में जानकारी मांगी, लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इस विभाग के लोक सूचना अधिकारी ने अब सह सचिव को जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। सतीश जोशी ने उत्तराखंड में नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट के सामने भी यह मामला रखा है। उनका कहना है कि उत्तराखंड के खूबसूरत स्थान की अस्मिता पर यह बड़ दाग है। किसी स्थान के नाम से बीमारी का नाम रखना उचित नहीं है। उन्होंने आरटीआई के जरिए प्रश्न पूछने के साथ रानीखेत रोग का नाम बदलने का भी सुझाव दिया है और मुहिम चलाई है। यहां बता दें कि रानीखेत सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण ही नहीं बल्कि सेना की कुमाऊं रेजीमेंट का मुख्यालय भी है।
इंसेट
रोग के लक्षण
- ब्रेन प्रभावित होते ही शरीर का संतुलन लड़खड़ता है, गर्दन लुढ़कने लगती है।
- कई बार शरीर के एक हिस्से को लकवा मार जाता है
- पाचन तंत्र प्रभावित होने पर डायरिया की स्थिति बनती है।
- मल पतला और हरे रंग का होने लगता है।
- डायरिया के चलते लीवर भी डैमेज होता है।
- सांस के नली के प्रभावित होने से सांस लेने में तकलीफ
इंसेट
केंद्रीय पक्षी विज्ञान संस्थान (सीएआरआई) बरेली के निदेशक डा. आरपी सिंह और पक्षी रोग विशेषज्ञ डा. एएस यादव ने बताया कि पैरामाइक्सो या रानीखेत वायरस पक्षियों के ब्रेन, पाचन और सांस नली पर हमला करते हैं। रानीखेत रोग जानलेवा है। हल्के रूप में यह जकड़ तो मृत्यु दर 10 से 15 फीसदी और गंभीर रूप धारण करने पर 50 से 60 फीसदी तक पहुंच जाती है। इसके उपचार को दवा ईजाद नहीं हुई है। हां, बचाव के लिये रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने को वैक्सीन लगाई जाती है।
कोट
इंसान में भी कई बार संक्रमण फैलने की स्थिति बनती है। हालांकि इंसान को गंभीर परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता। आंखों में कंजेक्टिवाइटिस (आंखों का लाल होना) की शिकायत उभरती है जो कि दवा लेने पर ठीक हो जाता है। -डा. आरपी सिंह, निदेशक, केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान, बरेली।
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