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चुनाव जीत गए मगर शहर छोड़ना पड़ा

Bareilly

Updated Sun, 28 Oct 2012 12:00 PM IST

बरेली। यह सन् 1967 की बात है। बरेली कॉलेज में छात्रसंघ अध्यक्ष पद के चुनाव की मतगणना में हुई धांधली की वजह से मैं एसपी सक्सेना उर्फ सत्तू से 12 वोट से हार गया था। मैंने शिकायत की तो प्राचार्य ने जांच कराने के बाद सत्तू को सस्पेंड कर दिया। असल में सत्तू के पिताजी ओपी सक्सेना प्रॉक्टर थे और वह भी मतगणना में मौजूद थे। मतगणना में गड़बड़ी की बात खुलने से वह इतना शर्मिंदा हुए कि उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। यहां तक कि कुछ दिनों बाद सत्तू और उनके पिता जी ने शहर भी छोड़ दिया और फिर कभी लौटकर नहीं आए। सत्तू के सस्पेंड होने के बाद प्राचार्य ने मुझे अध्यक्ष पद का चार्ज दे दिया। मैंने पूरे साल अध्यक्ष रहा। उस वक्त लोग गलत का समर्थन नहीं करते थे। यही वजह थी कि इस पूरे मामले में छात्र नेता, विद्यार्थी और शिक्षकों में से किसी ने भी सत्तू का साथ नहीं दिया। ऐसा पहली बार हुआ कि किसी को हारने के बाद पद दिया गया हो। तब छात्रसंघ में बीस हजार का फंड था, जिसे मैंने गरीब विद्यार्थियों को वजीफे के लिए दे दिया। इसके बाद एक विराट कवि सम्मेलन कराया, जिसमें काका हाथरसी भी आए थे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा ‘अंग्रेजी हटाओ’ आंदोलन चलाया। इस आंदोलन में पूरे शहर से अंग्रेजी में लिखे बोर्ड हटवा दिए गए। पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल भेज दिया, मगर कुछ ही दिन बाद हमें छोड़ दिया गया। हमने फिर आंदोलन शुरू कर दिया। मुझे छात्राओं के 80 फीसदी वोट मिले थे, क्योंकि मैं पढ़ने-लिखने वाला छात्र था। मैं रेगुलर एलएलबी की कक्षाएं करता था। तब एलएलबी की कक्षाएं शाम को लगा करती थीं। उस वक्त न तो धन और बाहुबल की राजनीति नहीं होती थी। न राजनीतिक पार्टियां छात्र राजनीति में दखलंदाजी करती थीं। आम विद्यार्थी चुनाव लड़ते और जीतते थे। मेरा मानना है कि छात्रसंघ चुनाव पंचायती राज व्यवस्था और संसदीय प्रणाली को जानने का एक मौका है। हर छात्रनेता को इसकी जानकारी होनी चाहिए। पहले टिकट छात्र तय करते थे। चाहे जिस विचारधारा का छात्रनेता हो, लेकिन तब कोई पार्टी या संगठन नहीं टिकट तय नहीं करता था। अब तो छात्रसंघ पर राजनीतिक पार्टियां हावी हो गई हैं। सामान्य विद्यार्थियों की इसमें कोई भूमिका रही ही नहीं, इसलिए वे राजनीति से दूर हो गए और छात्रसंघ भवन पर धन और बाहुबल की राजनीति करने वाले मुट्ठी भर लोगों का कब्जा हो गया। इसे खत्म कर फिर छात्रसंघ को बहाल करने की जरूरत है।
- अनिल कुमार, एडवोकेड, बरेली कॉलेज मेें 1967 में छात्रसंघ अध्यक्ष रहे
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