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आग बुझा नहीं सकते, फिर भी एनओसी

Bareilly

Updated Fri, 26 Oct 2012 12:00 PM IST

बरेली। फायर ब्रिगेड के अफसरों से अगर आप यह सवाल करें कि किसी बहुमंजिली इमारत में आग लगने पर वे उसे कैसे बुझाएंगे तो शायद उनके पास आश्वस्त करने वाला कोई जवाब न हो। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यही अफसर शहर में बहुमंजिली इमारतों को आंखें मूंदकर एनओसी दे रहे हैं। यह जानते हुए भी कि इन इमारतों में आग बुझाने लायक उनकी क्षमता ही नहीं है।
दरअसल फायर ब्रिगेड शहरियों की आग से सुरक्षा और संरक्षा के उपायों की जिम्मेदारी पूरी करने के बजाय उन्हें और ज्यादा खतरे में झोंकने का काम कर रहे हैं। मुख्य रूप से इस महकमे की तीन जिम्मेदारी हैं। एक तो रेस्क्यू ऑपरेशन, दूसरा फायर फाइटिंग और तीसरा एक्सीडेंट रेस्क्यू। बहुमंजिली इमारतों को एनओसी देने का मसला रेस्क्यू ऑपरेशन से जुड़ा है, हालांकि इस काम के लिए फायर ब्रिगेड के पास न के बराबर संसाधन हैं। पिछले कुछ समय में बीडीए ने शहर में कई ऐसी इमारतों को इजाजत दी है, जो दस मंजिल तक की होंगी। इन इमारतों में फायर फाइटिंग और रेस्क्यू ऑपरेशन करने की क्षमता न होते हुए भी फायर ब्रिगेड के अफसरों ने भी उन्हें एनओसी दे दी है।
ऊंची इमारतों में आग बुझाने या लोगों को बचाकर बाहर निकालने के लिए हाइड्रोलिक प्लेटफार्म, हाइड्रोलिक लैडर (सीढ़ी) और थर्मल इमेजिंग कैमरों की जरूरत होती है, लेकिन इनमें से कोई उपकरण फायर बिग्रेड के पास नहीं है। ट्रेन हादसों जैसी कोई बड़ी दुर्घटना होने पर भी रेस्क्यू ऑपरेशन की जिम्मेदारी भी फायर ब्रिगेड पर ही होतीहै। इसके लिए भी तमाम हाइड्रोलिक उपकरणों की जरूरत होती है, लेकिन ये उपकरण भी यहां फायर ब्रिगेड के पास नहीं हैं। फायर ब्रिगेड के पास अगर कोई संसाधन हैं तो सिर्फ आग बुझाने भर के, लेकिन वे भी पर्याप्त नहीं हैं। 48 लाख की आबादी में फायर ब्रिगेड की सिर्फ गाड़ियां इसी का एक उदाहरण हैं।

पीएनजी-सीएनजी से लगी आग भी नहीं बुझा सकते
अपने शहर में सीएनजी का एक स्टेशन तो चल ही रहा है और इसके अलावा कई लंबित हैं। रामपुर गार्डन, रामवाटिका कॉलोनी समेत कई हिस्सों के घरों की रसोई तक पीएनजी पहुंचा दी गई है। पीएनजी या सीएनजी से कहीं लग जाए तो उससे निपटने को फायर ब्रिगेड के पास ड्राई केमिकल पाउडर तक नहीं है। आंवला में तेल डिपो को ध्यान में रखकर फोम और फोम टेंडर (पानी के साथ फोम को मिलाने वाली गाड़ी) की मांग की गई है।
गाड़ियां भी हुई बीस साल पुरानी
कहने को तो जिले में आग पर काबू पाने के लिए सात फायर बिग्रेड की गाड़ी हैं। महज तीन गाड़ियां ही शहर के फायर स्टेशन के पास हैं, बाकी देहात में। इनमें से एक तो बीस साल पुरानी है और बाकी दो दस-दस साल पुरानी। कुल दमकल कर्मियों की तादाद भी सिर्फ 21 है।

सघन आबादी के मोहल्ले और संकरे रास्ते समस्या
सघन मोहल्लों में या दिन के वक्त शहर के दूसरे हिस्से में कहीं आग लगने पर फायर ब्रिगेड अक्षम ही साबित होती है। बड़ा बाजार, शहामतगंज जैसे इलाकों में अब वहां टैंकर बनवाने के लिए नगर निगम से मदद मांगी गई है। जिस तरह ट्रैफिक के हिसाब से शहर को दो हिस्सों में बंटना समस्या बना हुआ है, वैसे ही फायर ब्रिगेड की गाड़ियों का हर जगह पहुंचना समस्या है। पिछले दिनों स्टेडियम रोड पर ट्यूलिप टॉवर के पास रात के वक्त खड़े होकर सीएफओ ने टेस्ट किया तो सूचना के बाद गाड़ी पहुंचने में सात मिनट लगे, मगर दिन में इससे कम से कम चार गुना वक्त की दरकार होगी। शहर में सभी हाइड्रेंट खराब हैं, लिहाजा विकल्प के तौर पर पानी के ओवर हेड टैंक से कनेक्शन देने के लिए नगर निगम को लिखा गया है। शहर में तीन नए फायर स्टेशन के प्रस्ताव तो शासन को गए हैं, मगर उन्हें मंजूरी सालों बाद भी नहीं मिल पाई।

मीरगंज स्टेशन पर तो गाड़ी ही नहीं
मीरगंज में फायर स्टेशन तो है, मगर वहां कोई गाड़ी नहीं है। ऐसे में एक बुलेरो गाड़ी में ही पंप रख लिया गया है। कहीं अगर तालाब मिल जाए तो छोटी-मोटी आग बुझा पाना संभव है। बहेड़ी, फरीदपुर और नवाबगंज में एक ही एक गाड़ी है। इंडस्ट्रियल एरिया परसाखेड़ा में भी फायर स्टेशन पर भी एक ही गाड़ी है।

कम संसाधनों के बावजूद हम बेहतर सुविधा देने की कोशिश करते हैं, मगर सघन इलाके और ट्रैफिक जाम पर हमारा वश नहीं है। शासन स्तर से संसाधनों की मांग की गई है, स्थानीय स्तर पर भी कुछ इंतजाम के प्रयासों में जुटे हैं। -विवेक कुमार शर्मा, सीएफओ
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