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महंगाई से दवाएं भी देने लगी दर्द

Bareilly

Updated Sat, 29 Sep 2012 12:00 PM IST

सुमित
बरेली। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बढ़ती कीमतों से लोग पहले ही परेशान थे। अब दवाएं भी दर्द देने लगी हैं। मौसम बदलने पर वायरल और मलेरिया जैसी कई बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर दवाओं की बढ़ती कीमतों ने कोढ़ में खाज का काम किया है। पिछले छह महीनों में दवाओं के रेट दोगुना हो गए हैं। जिला अस्पताल हों या फिर निजी नर्सिगहोम सभी में मरीजों की भरमार है। जिला अस्पताल में प्रतिदिन मौसमी बीमारियों से पीड़ितों की संख्या 2500 का आंकड़ा पार कर चुकी है। मरीज बढ़े तो दवाओं की कीमतों ने भी रफ्तार पकड़ ली है। दवा के रेट में तेजी के कारण दवाइयों के कारोबार में नई कंपनियों की दस्तक मानी जा रही है। बुखार, डायबिटीज, खांसी, जुकाम, खाज खुजली, थाइरायड और हृदय रोग से संबंधित दवाइयों की कीमतों में चालीस से पचास प्रतिशत का उछाल आया है। साथ ही ताकत के लिए पाउडर और बिस्कुट भी मरीजों का पसीना छुड़ा रहे हैं। जिले में वर्ष 2008 में 300 करोड़ रुपए की दवाओं का कारोबार होता था। जो कि वर्ष 2012 में यह बढ़कर पांच सौ करोड़ रुपए पहुंच चुका है। हर साल दवाओं के कारोबार में 20 से 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो रही है। सरकार द्वारा लोगों को सस्ती दवा मुहैया कराने का दावा झूठा साबित हो रहा है।

कैसे बढ़ते हैं दवाओं के रेट

बाजार में हर साल नई नई दवा कंपनियों की भरमार हो जाती है। दवा कंपनियां ड्रग प्राइजिंग कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) से बचने के लिए तमाम हथकंडे अपनाती हैं। बुखार और जुकाम की दवा ‘नाइस’ साढ़े तीन रुपये की एक गोली है। यह डीपीसीओ से बाहर है, क्योंकि इसका नाम बदल दिया गया है। डीपीसीओं के दायरे में आने वाले ‘निसिप’ की गोली 30 पैसे की मिलती है। इसी नाम से मिलती झुलती दूसरी कंपनी की गोली साढ़े तीन रुपए की है। यानि तीन सौ गुना ज्यादा मुनाफा।

किन किन दवाओं के बढ़े रेट
सिर्फ छह महीने में बढ़े रेट
दवाओं के नाम अप्रैल (2012) सितंबर
टैक्सोलिन 14.76 47.25
मेट्रोजिल कंपाउंड 19.25 52.00
मैक्टोर एएसपी 18.90 40.00
एजटोर ए 18.50 83.00
क्लोपिडोग्रिल ए 43.60 78.00
थारोनाम 128 151
डायोनिल 10.00 12.00
कोरेक्स 65.00 74.00
लोमेला 65.15 110
सर्फाज एसएल 30.00 45.00
क्वाड्रिडर्म ट्यूब 32.00 41.00

जिले में रजिस्टर्ड नर्सिंग होम, अस्पताल और क्लीनिक
जिले में कुल प्राइवेट नर्सिंगहोम और अस्पताल: 126
क्लीनिक की संख्या: 370
एमबीबीएस डॉक्टरों की संख्या : 450
जिला अस्पताल में आते हैं प्रतिदिन 2500 मरीज
जिले में सीएचसी : छह
पीएचसी : 10
न्यू पीएचसी : 50

क्या कहती है ड्रग एसोसिएशन

ड्रग एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष दुर्गेश खटवानी ने कहा कि डीपीसीओ के दायरे में आने वाली दवाओं को 100 प्रतिशत तक मुनाफा कमाने की छूट है। मगर कंपनियां अपनी कॉस्ट से दो से तीन हजार गुना मुनाफा कमाती हैं। हम चाहतें हैं कि दवाओं के रेट पहले की तरह ही फिक्स किए जाएं, जिससे कंपनियां रेट बढ़ाने का कोई बहाना न अपनाएं।

बरेली केमिस्ट एसोसिएशन के महामंत्री और व्यवसायी चंद्रभूषण गुप्ता ने बताया कि 2008 में जहां दवाओं का सालाना टर्नओवर तीन सवा तीन सौ करोड़ था, वहीं 2012 में बढ़कर 500 करोड़ हो गया है। यह कारोबार 20-25 प्रतिशत की दर से बढ़ा है। बेशक चिकित्सा सुविधाएं बेहतर हुईं हैं, मरीजों को इलाज भी मिला है। मगर, साधन विहीन लोग इस महंगाई में इलाज कराने कहां जाएं।

क्या बोली जनता

- जिला अस्पताल में इलाज कराने पहुुंचे सिरौली के रामबाबू अपनी पत्नी का लंबे समय से हार्ट की बीमारी का इलाज करा रहे हैं। उनका कहना है कि महंगाई की मार के चलते इलाज कैसे कराया जाए। बच्चों को खाना खिलाएं या इलाज कराएं। क्या करें इंसान से बढ़कर कोई नहीं होता इसलिए इलाज मजबूरी है।
- महिला वार्ड में भर्ती किला की रहने वाली हसीना को कैंसर है। डॉक्टरों ने उन्हें उच्च चिकित्सा की सलाह दी है। लेकिन उनके पति के पास महंगी दवाओं के लिए न तो रुपए है और न ही प्राइवेट अस्पताल में इलाज करा सकते हैं।
- कैंट क्षेत्र के रहने वाले सुखलाल को सांस की बीमारी से पीड़ित हैं, वह जिला अस्पताल की दवाओं पर निर्भर हैं। इस महंगाई में इलाज कराना दुष्वार हो रहा है। एक तो पहले से महंगाई कमर तोड़ रही है और दूसरी तरफ दवाओं के रेट आसमान छू रहे हैं।

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क्या बोले चिकित्सा अधिकारी

एडी एसआईसी डॉ. आरसी डिमरी ने बताया कि जिला अस्पताल में अधिकांश तौर पर जीवन रक्षक दवाएं उपलब्ध हैं। गंभीर रोगों के इलाज की सुविधा देने की भी कोशिश की जाती है। मरीजों के इलाज में दवा बाहर से नहीं लिखी जाती है। डॉक्टर्स स्टाफ की कमी है।

सीएमओ डॉ. प्रभाकर सिंह का कहना है कि ‘शासन की नीतियों के अनुसार दवाओं की खरीद की जाती है। सीएसची-पीएचसी में जीवन रक्षक दवाएं भेजी जाती हैं।
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