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अच्छा है हर सिर पर छत का सपना, मगर ये सच्चा नहीं होता

Bareilly

Updated Mon, 24 Sep 2012 12:00 PM IST
बरेली। जिले के हर गांव में तमाम ऐसे परिवार हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी टूटे-फूटे कच्चे घरों में रहते आ रहे हैं। इन्हेंपक्का मकान देने को इंदिरा आवास योजना है, लेकिन वे इसका फायदा नहीं ले सकते। वजह, सन्-2002 में बनी बीपीएल सूची में उनका नाम नहीं है। जाहिर है, समय सरकारी मुलाजिमों की लापरवाही की वजह से बीपीएल सूची में वे जगह नहीं पा सके। अब हालात यह हैं कि मकान बनाने को मिले 5.31 करोड़ रुपये वापस करने पड़ रहे हैं।
केंद्र सरकार से अनुसूचित जाति के लिए 2510 आवास बनाने को बजट मिला है लेकिन 2002 की बीपीएल सूची के मुताबिक, जिले में सिर्फ 900 गरीब ही ऐसे हैं, जिनके पक्के मकान नहीं हैं। नतीजतन, केंद्र सरकार से मिली 5.31 करोड़ रुपये की रकम वापस करने का फैसला लिया गया है। यहां बता दें कि इस योजना में एक कमरे का मकान बनाने के लिए 45 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी जाती है। इसमें 33750 रुपये केंद्र और 11250 रुपये राज्य सरकार देती है।


फोटो -
बरसों से बाट जोह रहे घर की
मीरगंज। ब्लॉक शेरगढ़ के मल्साखेड़ा गांव के बाशिंदे रामचंद्र वाल्मीकि के पास एक बिस्वा भी जमीन नहीं है। घर के नाम पर झोपड़ी है। इसका छप्पर भी अब इस लायक नहीं है कि बारिश में भीगने से बचा सके। अभावों ने रामचंद्र और उनकी बीवी सुनीता को जवानी में ही बूढ़ा बना दिया है। इस सबके बावजूद इस परिवार को किसी योजना का लाभ नहीं मिला है। इंदिरा आवास तो सिर्फ सपना ही है। अमर उजाला प्रतिनिधि जब रामचंद्र के घर पहुंचा को वह अपने बेटे अमन के साथ मजदूरी करने जा चुके थे। घर पर सुनीता और बच्चे मिले। घर का हालचाल पूछा तो सुनीता ने बताया, ‘बहुत कोशिश की बीपीएल, एपीएल कार्ड बनवाने की लेकिन नहीं बन सका। आय प्रमाणपत्र भी नहीं बन रहा है।’ मुफलिसी की मार के चलते बड़ी बेटी पूनम आठवीं और बेटे अमन को छठी के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ गई। ग्राम प्रधान मीरा देवी ने भी माना कि परिवार वाकई बेहद गरीब है। इसके बावजूद सरकारी सुविधाओं से वंचित है। सफाई दी, वह कई बार सीडीओ को उसकी मदद के लिए लिख चुकी हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।


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बीपीएल सूची में नहीं दर्ज हुआ नाम
बहेड़ी। मुरचौड़ा गांव के जानकी प्रसाद जाटव 55 साल के हैं। पांच बेटे और दो बेटियां हैं। आरा मशीन पर मजदूरी करके जानकी बमुश्किल दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पाते हैं। वह आज तक इतना पैसा नहीं जुटा पाए कि एक अदद कमरे के लिए पक्की दीवारें खड़ी कर सकें। सांस के मर्ज की वजह से अब लगातार काम करने लायक भी नहीं रहे। उनकी सात संतानों में तीन बेटे बालिग हो चुके हैं। ढंग से किसी को भी पढ़ा-लिखा नहीं सके। सभी मेहनत मजदूरी करते हैं। सरकारी मुलाजिमों ने उन्हें 2002 में बनी बीपीएल सूची में शामिल नहीं किया। उन्हें किसी सरकारी योजना का फायदा नहीं मिल रहा है। जानकी प्रसाद कहते हैं, ‘कितनी बार एक कमरे के लिए इमदाद देने को प्रधान और तहसील के अफसरों के यहां चक्कर लगाए। बीपीएल सूची बनने से पहले भी अफसरों से गुहार की लेकिन किसी ने नहीं सुनी।’


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सूची में नाम होने के बावजूद परेशान
बिशारतगंज। मझगवां ब्लाक के गांव बलेई भगवंतपुर निवासी दलित मदन लाल सागर की पत्नी कमला देवी ने बताया कि उनके पति का नाम बीपीएल सूची में दर्ज है। उनके छह बच्चे है। पति के नाम6 जमीन नहीं है। न ही कोई सरकारी इमदाद मिलती है। पति मजदूरी कर परिवार का पालन पोषण करते हैं। सिर छिपाने के लिए छप्पर डाल रखा है। बारिश से बचने के लिए पन्नी ताननी पड़ती है। बलेई भगवंतपुर गांव के ही सियाराम सागर का नाम भी बीपीएल सूची में दर्ज है। वृद्धावस्था पेंशन के लाभार्थी भी हैं। सियाराम ने बताया कि उन्हाेंने आवास के लिए ब्लॉक के बहुत चक्कर काटे, पर किसी ने नही सुनी।


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ब्लॉक के चक्कर लगाते थक गए
मझगवां के ही अखा गांव निवासी मूलचंद्र सागर अपने परिवार के साथ पन्नी तान कर रह रहे हैं। परिवार में पत्नी के अलावा एक बच्चा है। मूलचंद्र भूमिहीन है। मजदूरी करके परिवार का पालन पोषण करते हैं लेकिन उन्हें इंदिरा आवास नहीं मिल सकता। वजह वही है कि बीपीएल सूची में उनका नाम दर्ज नहीं है। अखा गांव के ही संजीव सागर भूमिहीन हैं लेकिन उनके पास राशन कार्ड तक नहीं है। दो छोटे बच्चे हैं।



फोटो लाइन (ये फोटो बृहस्पतिवार को आए थे। शुक्ला जी ले लें)
20 वी एच आर ए-जानकी प्रसाद का झौपडा और उसके साथ उसके बच्चे।
20 वी एच आर डी- , , , , , ,।
20 वी एच आर बी-जानकी प्रसाद के झौपडे का अन्दर का हाल।
20 वी एच आर सी-जानकी प्रसाद।
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समाचार व एएलएबीआईएस 01 से 07 तक के सभी फोटो श्री अजीत बिसारिया जी को भेज दे।
बिशारतगंज। फोटो लाइन 01से 07 तक। एएलए बीआई एस 01
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