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कभी सोने के आगे और कभी पीछे दौड़ीं राशन की कीमतें

Bareilly

Updated Sat, 08 Sep 2012 12:00 PM IST

सिटी रिपोर्टर
बरेली। बुलंदी की ओर बढ़ती सोने की कीमत हर किसी को भले अक्सर चौंका देती हो, लेकिन असल में राशन की कीमतों की रफ्तार भी कुछ कम नहीं है। फर्क बस यह है कि सोना खरगोश की तरह छलांग लगाता है तो सुर्खियां बन जाती हैं, लेकिन कछुआ चाल से लगातार बढ़ रही आटा-दाल और चावल-तेल की कीमतें किसी का ध्यान नहीं खींचतीं। पिछले दो सालों का इतिहास देखा जाए तो राशन की कीमतों ने भी सोने के बराबर रफ्तार से दौड़ लगाई है। यह बात अलग है कि दोनों में कभी कोई आगे रहा और कभी कोई पीछे।
सोने और राशन की कीमतों का फर्क टटोलने की यह कोशिश सिर्फ इसलिए है क्योंकि सोना ऐश्वर्य का प्रतीक होने के नाते मन की संतुष्टि भर है, लेकिन आटे-दाल का सवाल जिंदगी के संघर्ष से जूझने वाले हर मध्यम और निम्नवर्गीय परिवार से जुड़ा है। इस लिहाज से भले ही सोना और राशन दोनों पर महंगाई बढ़ी है, लेकिन इसके सामाजिक परिणाम एक नहीं हो सकते। दो सालों में सोने की कीमत करीब डेढ़ गुना बढ़ी है। जिन लोगों ने इस पीली धातु में निवेश किया, उन्हें खूब फायदा हुआ। लेकिन आटे, वनस्पति घी, चावल, दाल आदि का भाव इस बीच दूना हो गया। रिफाइंड, तेल और चीनी की कीमतें भी डेढ़ गुनी हो गईं। मसालों का भाव तो सोने से भी ज्यादा तेज गति से दौड़ा। दो सालों में काली मिर्च, धनिया, लौंग और लाल इलायची का भाव तीन गुना से भी आगे निकल गया। लोगों को अपनी थाली में कटौती करनी पड़ी। रही-सही कसर पेट्रो पदार्थों के मूल्यों में ताबड़तोड़ वृद्धि ने पूरी कर दी।



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जिंस सितंबर 2010 सितंबर 2011 सितंबर 201ृ2
सोना 19200 27000 31600
आटा 125 145 195 (दस किलोग्राम)
अरहर 35 45 70
चावल 20 35 50
रिफाइंड 55 75 95
चीनी 25 30 38
तेल 75 90 98
वनस्पति घी 40 60 80

- (सोने का भाव प्रति दस ग्राम में)

मसालों सितंबर 2010 सितंबर 2011 सितंबर 201ृ2
काली मिर्च 200 300 475
धनिया 30 45 75
लौंग 215 400 750
लाल इलायची 275 900 1200

महिलाओं का किचन मैनेजमेंट हुआ गड़बड़

खाने के बजट में कम कर दिया
- इंद्रानगर में रहने वाली सीमा रस्तोगी ने कहा कि घर चलाने के लिए हम ही लोग खरीदारी करते हैं। अब आटा, चावल और दाल कीमतें रोज बढ़ रही हैं। महंगाई की वजह से पूरे महीने का बजट बिगड़ रहा है। अब बाजार जाने पर रोजमर्रा के सामान में कटौती भी करनी पड़ रही है।

रोज बढ़ रही महंगाई ने रुलाया
सिंधु नगर की रहने वाली सीमा अग्रवाल ने बताया कि हर रोज चीजों के दाम बढ़ने से महिलाओं की हालत सबसे ज्यादा खराब हो रही है। ऐसे में किचन के बजट को गड़बड़ कर दिया है। अब तो महंगाई के विरोध में सरकार के खिलाफ आंदोलन होना चाहिए।

हर गृहणी महंगाई के खिलाफ एकजुट हो
सुरेश शर्मा नगर की अंजलि शर्मा ने कहा कि महंगाई का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ रहा है, जो रोज कमाकर खाते हैं। उनके तो खाने के लाले ड़ गए हैं। मध्यम वर्गीय परिवारों को भी महंगाई ने काफी परेशान किया है। दरअसल, हम सबको एकजुट होकर महंगाई के खिलाफ काम करने की जरूरत है।

किचन संभालना हुआ मुश्किल
महानगर में रहने वाली डॉ. तृप्ता वर्मा ने कहा कि महंगाई अब समस्या बन गई है। हमारा किचन संभालना मुश्किल हो गया है। दाल, सब्जियों के दाम इतने ज्यादा बढ़ गए हैं कि बाजार में खरीदारी करते वक्त कई बार चीजों में कटौती करनी पड़ती हैं। महंगाई के लिए सीधे-सीधे सरकार दोषी है।

सोने के भाव और रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाले जिंस के दाम साल दर साल बढ़ते गए। जहां सोने पर निवेश करने वालों को खूब फायदा हुआ। वहीं जिंस की कीमतों में वृद्धि ने समाज के हर वर्ग के साथ किचन संभालने वाली महिलाओं के हाथ बांध दिए। लोगों ने थाली में कटौती करनी शुरू कर दी। महंगाई ने दो सालों में आम लोगों की जेब पर डाका डाल दिया। सरकार की नीतियां कहें या समय का तकाजा, महंगाई की मार झेलना ही अब लोगों की नियति बनती जा रही है।
इन दो सालों में सोना पर पैसा लगाने वालों की चांदी रही। जितना पैसा उन्होंने लगाया उसकी दूनी कीमत का फायदा हुआ। रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली चीजों के भाव रोज बढ़े। दिहाड़ी कमाकर रोज खाने वाले लोगों ने भी कटौती शुरू कर दी। उन्हें दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो गया है। जबकि मध्यमवर्ग भी इससे अछूता नहीं है। उन्हें महंगाई की मार झेलनी पड़ी। रोजमर्रा की चीजों के साथ ही रही सही कसर पेट्रो कीमतों के आसमान छूते दाम ने पूरा कर दिया। 2010 में जिन चीजों के दाम 100 रुपये था, वही सामान आज दोगुनी कीमत पर बिक रहा है। महंगाई ने समाज के हर वर्ग को परेशानी में डाला है। का उनके जीने की शैली में भी बदलाव करना पड़ा है।
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