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स्कूल ऑटो चालकों की हड़ताल खत्म

Bareilly

Updated Sat, 08 Sep 2012 12:00 PM IST
बरेली। डीएम के निर्देश पर मानक पूरे करने को 15 दिन की मोहलत मिलने पर स्कूली ऑटो रिक्शा चालकों की बेमियादी हड़ताल खत्म हो गई। ऑटो चालकों और अफसरों की वार्ता में तय हुआ कि स्कूली वैन का कलर पीला होगा। ऑटो समेत सभी वाहनों पर ‘स्कूल वाहन’ लिखवाया जाएगा। बच्चों की सुरक्षा को ऑटो में जाल लगवाए जाएंगे।
डीआईजी के आदेश पर स्कूली वाहनों के खिलाफ अभियान चलने से खफा ऑटो रिक्शा चालक दो दिन से हड़ताल पर थे। इससे लोगों को खासी परेशानी हो रही थी। डीएम ने शुक्रवार को हस्तक्षेप करते हुए एडीएम (एफआर) शिशिर सिंह को मामला सुलझाने के निर्देश दिए। एडीएम ने एआरटीओ प्रवर्तन परेश यादव और एसपी ट्रैफि क डीपी श्रीवास्तव के साथ ऑटो रिक्शा आनर्स वेलफेयर संगठन के अध्यक्ष जयराम गुप्ता, हरमीत सिंह बॉबी, संजय सक्सेना, संजय गुप्ता, हेमंत गुप्ता, पंकज पांडे, आशीष, प्रेमपाल सिंह से बात की। ऑटो चालकों ने मानक पूरे करने को समय देने की मांग रखी। इस पर एडीएम ने उन्हें 15 दिन का समय दे दिया। कहा, इस अवधि में सभी स्कूल वैन का कलर पीला हो जाना चाहिए। ऑटो में जाल लगवा लिए जाएं और क्षमता से अधिक बच्चे न बैठाए जाएं। स्कूली वाहनों का टैक्स जमा हो और फिटनेस भी समय से होती रहे। 15 दिन में मानक पूरे न होने पर फिर से अभियान चलाया जाएगा। सभी मुद्दों पर सहमति बनने के बाद ऑटो चालकों ने हड़ताल खत्म करने का ऐलान कर दिया। प्रशासन से वार्ता से पहले सुबह ऑटो चालकों ने दामोदर पार्क में इकट्ठा होकर धरना-प्रदर्शन किया।

आटो रिक्शा चालकों ने 15 दिन में सभी मानक पूरे करने का वायदा किया है। स्कूली वैन पीली नजर आएंगी, जबकि ऑटो रिक्शा की छत का कलर पीला होगा। रसोई गैस से चलने वाली वैन सीज कर दी जाएंगी। मानक पूरा न होने पर फिर से अभियान चलाया जाएगा।-डीपी श्रीवास्तव -एसपी ट्रैफिक

प्रशासन के अफसरों से वार्ता में स्कूली वैन का कलर पीला करने की बात हुई है। ऑटो रिक्शा का रंग नहीं बदलेगा। अधिकारियों ने इस पर सहमति जताई है कि जितने बच्चे आराम के ऑटो में बैठ जाएं, बैठा लें। सभी वाहनों पर स्कूल वाहन लिखवा लिया जाएगा।-जयराम गुप्ता, अध्यक्ष ऑटो रिक्शा आनर्स वेलफेयर संगठन



40 ड्राइवरों पर लाइसेंस नहीं मिले
बरेली। स्कूली वाहनों में ओवरलोडिंग के खिलाफ चलाए गए अभियान के दौरान 40 ड्राइवर बगैर लाइसेंस के वाहन चलाते पकड़े गए। इस दौरान ट्रैफिक पुलिस ने 440 स्कूली वाहन चेक किए। 65 स्कूल वाहनों में नंबर प्लेट और कलर समेत कई कमियां पाई गईं। 40 वाहनों पर फोन नंबर अंकित नहीं थे। अभियान में कुल 47 वाहनों का चालान किया गया और 49 हजार चार सौ रुपये शमन शुल्क वसूला गया।



फोटो...
हड़ताल ने बदल दी अभिभावकों की दिनचर्या

हड़ताल खत्म होने पर हुई राहत
शुक्रवार को भी खासे परेशान रहे

सिटी रिपोर्टर
बरेली। ऑटों की दो दिनी हड़ताल से तमाम बच्चे स्कूल नहीं जा सके। अभिभावकों को भी भारी परेशानी झेलनी पड़ी। उनके दैनिक कामकाज प्रभावित हुए। सुबह जल्दी उठकर बच्चों को छोड़ना पड़ा। छुट्टी के समय भी अपना कामकाज छोड़कर उन्हें लेने जाना पड़ा। शुक्रवार को देर शाम जब ऑटो चालकों ने हड़ताल खत्म करने की घोषणा की तो अभिभावकों ने राहत की सांस ली।
ऑटो वालों ने बृहस्पतिवार को बिना किसी पूर्व सूचना के अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी थी। इससे अभिभावकों की मुसीबत हो गई। अभिभावकों ने कहा कि बगैर नोटिस हड़ताल करने पर ऑटो वाले के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। वे चार महीने का एडवांस किराया ले चुके हैं। एक महीने से ज्यादा कर्फ्यू में चला गया और अब ये हड़ताल। दरअसल, शासन ने बच्चों को स्कूल ले जाने वाले वाहनों के लिए तय नियम-कायदों पर सख्ती से अमल कराने के निर्देश दिए थे। पुलिस ने सख्ती की तो ऑटो वालों ने विरोध किया और हड़ताल पर चले गए। स्कूलों में शुक्रवार को भी बच्चों की उपस्थिति काफी कम रही।

ऑटो वाले कर रहे मनमानी
डेलापीर के राजेश बेटी को लेने जीआरएम पहुंचे। बोले, ऑटो वालों ने कोई नोटिस नहीं दिया और हड़ताल कर दी। ऐसे में काफी दिक्कत हुई। राजेंद्र नगर की पूर्णिमा मेहरा ने कहा कि हमें अपना रुटीन बदलना पड़ा। सुबह बच्चे को लेकर स्कूल भागना पड़ा। अब लेने भी आए हैं। अभिभावक शुभ्रा बंसल और मुक्ता अग्रवाल ने कहा कि बच्चों की पढ़ाई का भी काफी नुकसान हुआ है।

पापा को देर हुई तो रो पड़ी नव्यता
बरेली। सेंट मारिया स्कूल में लोअर नर्सरी की नव्यता छुट्टी होने पापा के लेने न पहुंचने पर रोने लगी। बोली, अब घर कैसे जाएंगे। ऑटो की हड़ताल से ऐसा कई बच्चों के साथ हुआ। शुभी को उनके बुजुर्ग बाबा को लेने आना पड़ा। क्योंकि, उनके पापा को फुर्सत नहीं मिली। साबिर अली को लंच छोड़कर नर्सरी में पढ़ रही बेटी को लेने आना पड़ा। सेंट अल्फोंसिस स्कूल में पढ़ने वाली हिमांशी भाटिया के पिता नितिन बोले, ऑटो वाले पूरे साल का इकट्ठा पैसा मांगते हैं। छुट्टियों की भी कटौती नहीं करते।
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