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उन्हें तो कर्फ्यू की यह ढील भी रुला गई

Bareilly

Updated Sat, 28 Jul 2012 12:00 PM IST
बरेली। प्रशासन ने शुक्रवार को कर्फ्यू में कुछ घंटे ढील दी। मकसद था, लोग जरूरत का सामान खरीद लें। शहरवासियों ने इसका फायदा भी उठाया। लेकिन एक तबका ऐसा भी था, जो चाहकर भी घर से नहीं निकल सका। उसे तो यह छूट भी रुला गई। दरअसल, वे जरूरत का सामान खरीदने तो तब जाते जब पास में पैसे होते। छह दिन से काम नहीं मिला। जो पास था, वह भी खर्च हो चुका है।
मलूकपुर नाला वाली मस्जिद के पास किराए के छोटे से कमरे में फरजाना अपने बच्चों के साथ रहती हैं। पतला सा जीना चढ़कर जब ऊपर पहुंचे तो फरजाना कमरे में बेहद उदास बैठी थीं। बातचीत कर्फ्यू में छूट मिलने से शुरू हुई। जरूरत के सामान की खरीददारी के बारे में पूछा तो उनकी आंखों में बेबसी के आंसू छलक आए। कुछ पल खामोश रहीं फिर बोलीं, कर्फ्यू में छूट तो उनके लिए है जिनकी जेब में दाम है। पांच दिन हो गए चांद (पति) को बिना रिक्शा चलाए। घर के हालात शुरू से ऐसे रहे हैं कि शाम को जब चांद रिक्शा चलाने के बाद आटा-सब्जी लेकर आते हैं, तभी चूल्हा जलता है। पति-पत्नी और बच्चों को मिलाकर आठ लोगों का परिवार है। घर में जो कुछ बचाकर रखा था उससे अब तक का किसी तरह काम चल गया। अब न घर में राशन बचा है और न पास में पैसे। आज तो एक रिश्तेदार खाना दे गए, जिससे बच्चों का गुजारा हो गया। आगे का पता नहीं।
शुक्रवार की शाम जोगी नवादा में वनखंडी नाथ मंदिर के पास लोग सब्जी खरीदने को लाइन लगाए थे। पास ही पड़े तख्त पर तीन लोग उदास बैठे थे। पूछने पर उन्होंने अपना नाम राकेश, सोनू और पंचम बताया। सोनू और पप्पू साले बहनोई हैं। तीनों रिक्शा चलाते हैं। सिपाही ने इशारा करके सब्जी जल्दी खरीदने को कहा। तो तीनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। पंचम बोले- पांच दिन हो गए घर पर खाली बैठे। हैं। एक रुपये की कमाई नहीं हुई। सब्जी कहां से खरीदें। एक-दो दिन और काम पर नहीं निकले तो बच्चों के भूखे रहने की नौबत आ जाएगी। राकेश और सोनू का भी यही हाल है।
फरजाना, पंचम, राकेश और सोनू जैसे इस शहर में न जाने कितने लोग हैं, जिनके घर में राशन का एक दाना नहीं है। दुकान से खरीद सकें, इसके लिए जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं है। उनकी मदद को न तो प्रशासन पहुंच रहा और न कोई समाजसेवी। उन्हें सिर्फ ऊपर वाले का सहारा है। वे यही दुआ कर रहे हैं कि शहर के हालात जल्द ठीक हों और वे काम पर निकलें।
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