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दूषित पानी पीने से डायरिया के मरीज बढ़े

Bareilly

Updated Wed, 02 May 2012 12:00 PM IST
शहरियों को शुद्ध पेयजल मुहैया नहीं करा पा रहा नगर निगम, पांच इलाकों से लिए गए पानी के नमूने फेल
010: अलग-अलग इलाकों से पानी के 287 सैंपल अप्रैल में भरे गए।
005: इलाकों के सभी सैंपल फेल हो गए। इनमें क्लोरीन नहीं मिली।
360: शिकायतें दूषित पानी की जनवरी से अब तक नगर निगम में दर्ज।

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केस वन- प्रेमनगर के भूड़ इलाके में रहने वाली वसीमा का परिवार नगर निगम की पेयजल आपूर्ति पर निर्भर है। वसीमा 15 दिन से डायरिया से पीड़ित हैं। कई दिनों से वह जिला अस्पताल में भर्ती हैं।
केस टू- पुराने शहर के सैलानी इलाके में रहने वाले आरिफ की दो साल की बेटी शमरीन को भी कई दिन पहले डायरिया होने के बाद जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनके यहां भी नगर निगम का पानी आता है।
केस थ्री- कोतवाली के पीछे रहने वाले मो. कासिम के आठ महीने का बेटा मो. कलीम भी जिला अस्पताल में भर्ती है। उसे कई दिन पहले डायरिया हो गया था। इनके यहां भी नगर निगम का पानी इस्तेमाल होता है।
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सुमित
बरेली। सिर्फ तीन महीनों में नगर निगम में शहर के अलग-अलग इलाकों से दूषित पानी की 360 शिकायतें और जिला अस्पताल में रोजाना औसतन डायरिया के 20 मरीजों की भर्ती। सिर्फ यही आंकड़ा यह बताने को काफी है कि दूषित पानी की वजह से शहरियों को क्या खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। नगर निगम प्रशासन हालांकि इसके बावजूद यह दावा करने में नहीं हिचकिचाता कि वह लगातार पानी की जांच करा रहा है, लेकिन असलियत यह है कि शहर के ज्यादातर इलाकों में लोगों को पीने के लिए जो पानी मुहैया कराया जा रहा है, वह मानकों के हिसाब से पीने लायक है ही नहीं।
नगर निगम के दावे की असलियत इस बात से भी जाहिर होती है कि अप्रैल में जिला संक्रामक रोग विभाग और नगर स्वास्थ्य विभाग की ओर शहर में पानी के जो सैंपल भरे गए, उनमें पांच अलग-अलग इलाकों के सैंपल जांच में फेल हो गए। दरअसल, शहरियों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने की जिम्मेदारी नगर निगम के जलकल विभाग पर है। जलकल विभाग इसके लिए सिर्फ यह सुनिश्चित करता है कि पानी में क्लोरीन मिलाई गई हो। लिहाजा पानी में चाहे सीवर मिला हुआ हो लेकिन अगर उसमें क्लोरीन है तो जलकल विभाग की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। क्लोरीनेशन के अलावा पानी में हैवी मेटल्स की जांच की जाती है, लेकिन इसके लिए पानी के सैंपल लखनऊ भेजे जाते हैं। मगर नवंबर 2011 के बाद से हैवी मेटल्स की जांच के लिए पानी के सैंपल लखनऊ भेजे ही नहीं गए हैं।

दस इलाकों में जांच, पांच के नमूने फेल
नगर निगम के जलकल विभाग ने अप्रैल में शहर में आपूर्ति किए जा रहे पानी की जांच का अभियान चलाया था। जलकल विभाग के अफसरों के मुताबिक इस अभियान में पूरे महीने के दौरान शहर के अलग-अलग दस इलाकों से कुल मिलाकर पानी के 287 नमूने लेकर जांच कराई गई। इनमें से पांच इलाकों के सारे नमूने फेल हो गए। यानी इनमें क्लोरीन नहीं पाई गई। जाहिर है कि गर्मी के मौसम में दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमारियों का खतरा ज्यादा होने के बावजूद नगर निगम की ओर से इस संबंध में कोई खास एहतियात नहीं बरती जा रही है।

तीन दिन में डायरिया के 50 मरीज
दूषित पानी का इस्तेमाल ही सबसे बड़ा कारण है कि गर्मी की शुरुआत में ही शहर में बड़े पैमाने पर लोग डायरिया की चपेट में आने लगे हैं। जिला अस्पताल के रिकॉर्ड के मुताबिक पिछले तीन दिनों में ही यहां पचास से ज्यादा डायरिया के मरीज भर्ती हुए हैं। जिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना डायरिया पीड़ित 15-20 मरीज आते हैं। यही हाल शहर के निजी अस्पतालों का भी है। जिला अस्पताल की डॉ. सुरभि प्रकाश के मुताबिक डायरिया की सिर्फ दो ही वजह होती है, गंदा पानी पीना या फिर दूषित खाने का इस्तेमाल।

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और भी खतरनाक हो सकता है दूषित पानी का इस्तेमाल
सिर्फ डायरिया ही नहीं, दूषित पानी का इस्तेमाल और भी गंभीर बीमारियों का शिकार बना सकता है। जिला अस्पताल की सीनियर फिजिशियन डॉ. सुरभि प्रकाश के मुताबिक गंदा पानी पीने से टायफाइड, पीलिया, उल्टी, दस्त, हेपेटाइटिस-ए, डिहाइड्रेशन जैसी बीमारियां भी हो सकती हैं। पेट की ज्यादातर बीमारियां गंदा पानी पीने की ही वजह से होती हैं। डॉ. सुरभि बताती हैं कि गंदा पानी पीने से कीटाणु सीधे पेट में पहुंचते हैं, लिहाजा कोई भी संक्रमण ज्यादा तेजी से होता है। डॉ. सुरभि के मुताबिक अगर लगता है कि पानी गंदा लगे तो उसे 20 मिनट तक खौलाकर पीना चाहिए। इससे पानी में मौजूद कीटाणु खत्म हो जाएंगे। पानी को साफ करने के लिए उसमें क्लोरीन भी मिलाई जा सकती है। अगर मुमकिन हो तो आरओ और एक्वागॉर्ड का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
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यह होता है शुद्ध पेयजल
बरेली कॉलेज के बॉटनी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आलोक खरे के मुताबिक, शुद्ध पेयजल में ऑक्सीजन की मात्रा 15 एमजी प्रति लीटर से कम नहीं होनी चाहिए। पानी में घुले बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा भी पांच एमजी प्रति लीटर से ज्यादा न हो। पानी में ईकोलाई बैक्टीरिया नहीं होना चाहिए। इसके अलावा पानी में कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम और पोटैशियम की निश्चित मात्रा होनी चाहिए। जबकि लेड, कैडमियम, आर्सेनिक, मरकरी, जिंक और निकिल आदि हैवी मेटल्स की मात्रा बिलकुल नहीं होनी चाहिए।


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‘हमारी टीम शहर के अलग-अलग इलाकों में जाकर पानी की शुद्धता की जांच करती है। हम पानी में क्लोरीन की मात्रा देखते हैं। सैंपल लेने के बाद हम जलकल विभाग और नगर स्वास्थ्य विभाग को रिपोर्ट भेज देते हैं।’ डॉ. एके त्यागी, सीएमओ

‘हम लगातार पानी की जांच कराकर यह देखते हैं कि उसमें क्लोरीन मिली है या नहीं। जांच रिपोर्ट जलकल विभाग को भेज दी जाती है। पानी में हैवी मेटल्स की जांच के लिए सैंपल लखनऊ भेजे जाते हैं। -डॉ. रवि कुमार, नगर स्वास्थ्य अधिकारी

‘प्राकृतिक स्रोतों से आना वाला पानी तो शुद्ध होता ही है। हम पानी में क्लोरीन इसलिए डालते हैं, ताकि कहीं पानी की पाइप लाइन लीक होकर सीवर से जुड़ गई हो या उसमें और कोई गंदगी मिली हो तो वह साफ हो जाए। पानी में क्लोरीन मिलाने के लिए 48 डोजर हैं। -आरबी राजपूत, अधीक्षण अभियंता जलकल विभाग
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