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कब बदलेगी फुटपाथ के पथरकटों की तकदीर

Banda

Updated Mon, 08 Oct 2012 12:00 PM IST
बांदा। रोडवेज बस स्टैंड के आसपास फुटपाथ पर तीन दशक से बसे करीब दर्जनभर पथरकटों को सरकारी सुविधाएं नसीब नहीं हो पाईं। सिल-लोढ़ा आदि बनाकर किसी तरह से परिवार का गुजारा कर रहे इन परिवारों को गर्मी, सर्दी हो या बारिश सभी मौसमों में मुसीबत झेलना नियति बन चुकी है। इनके बच्चे स्कूल जाने के बजाए पूरे दिन मां-बाप के साथ पत्थर काटने में हाथ बंटाते हैं। पथरकटों को राशनकार्ड, कांशीराम आवास या अन्य योजनाओं का लाभ न मिलने का मलाल है।
रोडवेज बस स्टैंड से हेड पोस्ट आफिस तक फुटपाथ पर झुग्गी बनाकर बसे करीब पांच पथरकट परिवार तीन दशकों से उसी हाल में हैं। सरकार गरीबों व असहायों के लिए दर्जनों कल्याणकारी योजनाएं संचालित कर रही है, पर ये इन तक नहीं पहुंच सकीं। एक पथरकट परिवार के मुखिया प्रताप और उसकी पत्नी फूलमती इसे अपनी नियति मान कर चुप हैं। प्रताप बताते हैं कि वे मूलत: फतेहपुर के बाशिंदे हैं। 70 के दशक में यहां आकर बसे पथरकट परिवारों का हाल आज भी बदहाल है। पता नहीं कब उनकी तकदीर बदलेगी? प्रताप के शशि, मनोरमा, पूनम, जानकी व रागिनी पांच पुत्रियां व नरेंद्र तथा रामचरन दो पुत्र हैं। बड़ी तीन पुत्रियों की वह शादी कर चुका है और दो जवान बेटियां उसके काम में हाथ बंटाती हैं। पेयजल के लिए इन्हें करीब 100 मीटर दूर डाकखाना या बस अड्डा जाना पड़ता है। परिवार के लोग सुलभ कांपलेक्स में पैसे देकर शौच को जाते हैं। प्रताप की पत्नी फूलमती ने बताया कि हर मौसम उन पर कहर बन जाता है। बीते वर्ष उसकी बहू रीना ठंड से खत्म हो गई। उसके दो नाती भी मौसम के कहर का शिकार बन गए। कांशीराम आवास के लिए भागदौड़ की। बात नहीं बनी तो जिलाधिकारी के पास गए। उनके आदेश को तहसील में अनदेखा कर दिया गया। राशन कार्ड बनवाने के लिए कई बार डीएसओ दफ्तर के चक्कर काटे। वहां से सिर्फ फटकार कर चलता कर दिया जाता है। बिना मकान के जवान बेटियां खुले में रात दिन बिताती हैं। मनचले व शराबी अक्सर झुग्गी में आकर उपद्रव करते हैं। प्रताप ने बताया कि पहले की अपेक्षा अब पत्थर महंगा हो गया है। कमाई सिर्फ इतनी होती है, जिससे दो वक्त की रोटी मिल जाती है। प्रताप की पांच बेटियों व दो बेटों ने स्कूल का मुंह नहीं देखा।
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