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भ्रष्टाचार का गढ़ बना आरटीओ दफ्तर

Banda

Updated Tue, 25 Sep 2012 12:00 PM IST
बांदा। शासन द्वारा सरकारी विभागों में लागू की गई जनहित गारंटी योजना जिले में बेअसर है। इसके दायरे में आने वाले कुछ विभागों ने योजना से संबंधित बोर्ड लगा रखा है, पर आरटीओ महकमा अलहदा है। यहां अपने काम के लिए जनता को आज भी दलालों का सहारा लेना पड़ता है। ड्राइविंग लाइसेंस, परमिट, लाइसेंस का नवीनीकरण कराना हो या फिर वाहनों का रजिस्ट्रेशन, बिना दलालों के यहां कुछ भी संभव नहीं है।
सरकारी दफ्तरों से संबंधित कार्यों में फिजूलखर्ची रोकने तथा समय से फरियादियों का काम हो, इसके लिए सूबे में विगत वर्षों जनहित गारंटी रोजगार योजना लागू हुई। कुछ सरकारी विभागों में इसके बड़े-बड़े बोर्ड व होर्डिंग्स लगाई गईं ताकि जनता को इसकी जानकारी हो सके। दलालों के लिए बदनाम संभागीय परिवहन महकमे में यह कानून पहुंच ही नहीं सका। यहां न तो कोई ऐसा बोर्ड लगा है और न ही जनता को कोई इसका लाभ मिल रहा है। सुबह दफ्तर खुलते ही दफ्तर के आसपास दर्जनों की संख्या में दलाल मंडराने लगते हैं। इन दलालों का संपर्क सीधे संबंधित बाबुओं व एआरटीओ से रहता है। यदि जनता सीधे अधिकारियों के पास जाती है तो उन्हें डाट-फटकार कर भगा दिया जाता है। ‘अमर उजाला’ ने सोमवार को आरटीओ दफ्तर में पड़ताल किया तो भ्रष्टाचार व दलाली की हर सीमाएं देखने को मिलीं।
गाड़ी सीज किए जाने के बाद कागजात लेकर छुड़ाने आए मोहम्मद खालिद ने बताया कि वाहन के बीमा से लेकर सारे कागजात पूरे हैं। बावजूद इसके उनके वाहन को सीज कर दिया गया। अब 25-30 हजार रुपए जुर्माना व अन्य फीस वसूली जा रही हैं। बताया कि इसी धनराशि में बाबू व अफसर मिल बांट लेते हैं। उधर, ड्राइविंग लाइसेंस व वाहनों के रजिस्ट्रेशन में भी लोगों को जेब ढीली करनी पड़ती है। दलाल इसका डीएल के लिए 500 तथा पंजीयन के लिए हजार से लेकर जितना खींच सकें, निर्धारित किए हैं। परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार को लेकर कई बार सामाजिक व विभिन्न संस्थाओं ने आवाज उठाई, पर प्रशासन इस पर अंकुश लगा पाने में नाकाम रहा।
संभागीय परिवहन अधिकारी अनिल कुमार मिश्रा ने दलालों की सक्रियता से इनकार किया। उन्होंने कहा कि जनता उनसे इस बाबत शिकायत कर सकती है, जबकि उप संभागीय परिवहन अधिकारी दीपक शाह ने इस संबंध में कुछ बताने के बजाए फोन ही काट दिया।
जनहित गारंटी कानून के तहत आरटीओ विभाग में डीएल, वाहनों के पंजीयन, परमिट के लिए भले ही काम का समय 20 दिन निर्धारित हो, पर यहां अलग ही कानून चलता है। फरियादी यदि कमीशन की धनराशि जमा कर देता है तो उसका काम 20 दिन के पहले ही हो जाता है। यदि कोई फरियादी सीधे अफसरों से मिलकर काम कराने की कोशिश करता है तो उसे महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं।
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