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300 जमातें गठित कर देश भर में रवाना की गईं

Banda

Updated Tue, 18 Dec 2012 05:30 AM IST
रशीद सिद्दीकी
हथौरा (बांदा)। अपने परवरदिगार से दिल खोलकर मांगा। लाखों हाथ आसमान की तरफ उठ गए। नीचे झुकीं नजरों में आंसू छलक पड़े। इज्तिमा (इस्लामिक सम्मेलन) के आखिरी लम्हात (क्षण) कुछ ऐसे ही बीते। मंच पर मौजूद मौलाना की दुआ पर पंडाल से एक साथ ‘आमीन’ की सदाएं गूंजती रहीं। दुआ के बाद यहीं पर गठित 300 जमातों को इज्तिमा स्थल से ही पूरे देश के विभिन्न जिलों और शहरों के लिए रवाना कर दिया गया। इसी के साथ तीन दिनी तब्लीगी इज्तिमा सोमवार को यहां खत्म हो गया।
इज्तिमा की कामयाबी का पैमाना आयोजकों की नजर में जमातों का गठन (तशकील) और तब्लीग के लिए उनकी रवानगी है। आयोजक इस बात पर खुश हैं कि इज्तिमा में 300 जमातें गठित हुईं हैं। हर जमात में औसतन 11 से 18 लोग शामिल रहे। उलमा ने इन सभी से मंच पर मुलाकात की और दुआएं दीं।
समूचे देश से आए कई लाख लोग पिछले दो दिनों से दिन भर उलमा की नसीहतों का जाम पी रहे थे। सोमवार को सुबह भी इल्मे-दीन से भरपूर आखिरी खिताब दिल्ली मरकज से आए मौलाना साद ने किया। लगभग दो घंटे के बयान में मौलाना ने जमाती जत्थों से कहा कि जो बात यहां सुनीं और सीखी हैं उस पर खुद अमल करें और दूसरों तक पहुंचाएं। तभी उनकी यहां आमद कारगर होगी। इश्तिमाई आमाल (सामूहिक गतिविधि) के फजायल (फायदे) ज्यादा हैं। उन्होंने जमातों से कहा कि जो काम पैगंबर हजरत मोहम्मद छोड़कर गए हैं उसे पूरा करना उम्मत का काम है। जो भी करें अल्लाह की रज़ा के लिए करें। सहाबा (मोहम्मद साहब के अनुयायी) की जिंदगी से सबक लें।
लगभग दो घंटे के बयान के बाद मौलाना साद ने 11:45 बजे दुआ शुरू करा दी। दुआ शुरू होते ही लाखों का हुजूम जो दुकानों और मैदानों में घूम रहा था वह पंडाल की ओर दौड़ पड़ा जिसको जहां जगह मिली वहीं बैठ गया। दोनों हाथ आसमान की ओर उठ गए। नजरें नीचे झुक गईं। माइक पर साफ सुनाई दे रही हर दुआ पर पंडाल ‘आमीन’ से गूंजता रहा। कई बार हजारों लोग जार-जार रो पड़े। दुआ में ज्यादातर तब्लीगी कामों की कामयाबी और कुबूलियत मांगी गई। देश-दुनिया में अमन और खुशहाली तलब की गई। दुआ के वक्त पंडाल को छोड़कर समूचा इज्तिमागाह सूना हो गया। 32 लाख वर्ग फिट के पंडाल में तिल रखने की जगह नहीं बची। लाखों लोगों कोे पंडाल के बाहर खुले मैदान में बैठककर दुआ में शरीक होना पड़ा।
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