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निर्जल उपवास रखकर रचाया तुलसी विवाह

Banda

Updated Sun, 25 Nov 2012 12:00 PM IST
बांदा। देवोत्थानी एकादशी का पर्व श्रद्धालुओं ने श्रद्धा व उल्लास के साथ पंरपरागत तरीके से मनाया। शहर व गांव रंगीन विद्युत झालरों व दीपकों की चकाचौंध से जगमगा उठे। कार्तिक मास स्नान करने वाली महिलाओं ने निर्जल उपवास रखा। भगवान विष्णु व तुलसी का विवाह धूमधाम से रचाया। श्रीकृष्ण की मंदिर व घरों में विधिवत पूजा-अर्चना की। महिलाओं ने देर शाम भगवान विष्णु का पूजन कर गन्ना व लाई-कमल गट्टा का प्रसाद चढ़ाया। देर रात तक उत्साहित बच्चों ने आतिशबाजी की।
देवोत्थानी एकादशी को लेकर मान्यता है कि इस पर्व पर भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने से मोक्ष व स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इसी दिन से गन्ना की फसल भी तैयार मानी जाती है और इसकी पेराई का काम शुरू होता है। ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में शनिवार को देवोत्थानी एकादशी का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। गांवों में महिलाओं ने गन्ना पूजन किया तथा लोगों ने खेतों व मंदिरों में दिए जलाए। दीयाली व विद्युत झालरों की रोशनी से घर मकान जगमगा उठे। देर रात तक बच्चों ने आतिशबाजी का लुत्फ उठाया। बाजार में जगह-जगह गन्ना की दिन भर बिक्री हुई।
महिलाओं के समूहों ने देर शाम तुलसी पूजन कर धूमधाम से विष्णु-तुलसी विवाह रचाया। उपवास रखकर महिलाओं ने आंगन में लगी तुलसी को आकर्षक ढंग से सजाया। श्रृंगार का सामान व तरह के पकवान बनाकर भोग लगाया। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं ने तुलसी विवाह में बकायदा सामूहिक भोज भी किया। इस संबंध में कथा प्रचलित है कि वृंदा, शंखासुर दैत्य की पतिव्रता पत्नी थी। भगवान ने इस दैत्य को मारने की कोशिश की, पर वृंदा के सतित्व के कारण वह मार नहीं सके। तब वृंदा के स्नान करते समय भगवान ने शंखासुर का रूप धारण किया और उससे मिलन किया। पतिव्रत टूटने से वृंदा ने भगवान को पत्थर होने का श्राप दे दिया। इस पर भगवान ने इसका कारण बताया और वृंदा को वृक्ष होने का श्राप दे दिया। कहा कि मैं तुम्हारे बिन नहीं रह सकता। कलयुग में भगवान गांडकी नदी में ठाकुरजी के रूप में प्रकट हुए और वृंदा वृंदावन में तुलसी के रूप में। यह वृतांत देवी भागवत तथा भविष्येत्तर में मिलता है। तभी से तुलसी और ठाकुर जी का विवाह कर सभी लोग अपने को धन्य मानते हैं।
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