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जर्मनी की महिला किसान सीख रही खेती

Banda

Updated Sun, 28 Oct 2012 12:00 PM IST
बांदा। ‘फारमर्स शुड सर्च मैथेड्स आफ एग्रीकल्चर व्हिच कैन फुलफिल रिक्वायरमेंट आफ रिसपांसबिलिटी। इनक्रीच इनकम एकार्डिंग टू इनक्रीचिंग एज एंड डेक्रेजिंग फिजिकल पावर’ यानि किसानों को उन तरीकों को खोजना चाहिए जिसमें ज्यादा आमदनी हों और जरूरतें पूरी हो सकें। जिम्मेदारियों को अच्छी तरह निभाया जा सके। बढ़ती उम्र में सुविधा का अभाव न रहे।
यह कहना है कि जर्मनी की स्नातक किसान स्टफनी का। वह इन दिनों भारतीय खेतीबाड़ी के गुर सीखने यहां आईं हुई हैं। प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह अपने बड़ोखर खुर्द स्थित कृषि फार्म में उन्हें खेती-किसानी के गुर सिखा रहे हैं। जर्मन के उल्म शहर के रहने वाली स्टफनी भारतीय खेती सीखने को दो माह के लिए यहां आईं हुई हैं। पिछले करीब एक पखवारे से वह हर वो काम सीख रही हैं जो आमतौर पर भारतीय किसानों की दिनचर्या है।
25 वर्षीय स्टफनी का कहना है कि बढ़ती उम्र से शरीर कमजोर होने लगता है। जिम्मेदारियां भी बढ़ने लगती हैं। इन हालात में ज्ञान काम आता है। किसानों को ऐसे तरीके खोजना चाहिए जिसमें आमदनी ज्यादा हो और उनकी जरूरतें पूरी हो सकें। स्टफनी ने बेबाकी से कहा कि आर्गनिक खेती से जरूरतें पूरी हो सकती हैं। जर्मनी युवती को मलाल है कि बुंदेलखंड के युवा दूसरे शहरों में पलायन करके वहां काम कर रहे हैं जबकि उन्हें खेती व्यवसाय को चुनना चाहिए। खेती में शोध करना चाहिए। चुपचाप नहीं बैठना चाहिए। वह कहती हैं ‘एग्रीकल्चर वेरी इंट्रेस्ंिटग वर्क’ (कृषि बेहतरीन व्यवसाय है)।
स्टफनी पहली बार भारत आईं हैं। उन्होंने किसान प्रेम सिंह के बारे में सुन रखा था। इसीलिए यहां आकर प्रेम सिंह की मेहमान बन गईं हैं। हिंदी बोलना भी सीख रही हैं। कृषि फार्म में रहने वाली एक सात वर्षीय बालिका खुशी से स्टफनी की काफी दोस्ती गठ गई है। स्टफनी रोजाना सुबह गाय, भैंस का दूध दुहती हैं। खेतों की गुड़ाई और पेंटिंग करती हैं। दिन भर खेती के बारे में बातचीत में समय बिताती हैं। टूटी-फूटी हिंदी बोलना आ गया है।
स्टफनी ने अपनी बात ‘बुंदेलखंड आच्छा है, नमस्ते’ कहकर खत्म की। प्रेम सिंह ने बताया कि स्टफनी को भारतीय खेती के तौर-तरीके सुहा रहे हैं। वह आर्गनिक खेती को व्यवसाय के रूप में चुनना चाहती हैं।
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