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होटल-ढाबों में सिसक रहा कई का बचपन

Banda

Updated Fri, 12 Oct 2012 12:00 PM IST
बांदा। होटल, ढाबों व मोटर गेराज में तमाम मासूमों का बचपन सिसक रहा है। करीब 50 हजार बाल श्रमिक रात-दिन जी-तोड़ मेहनत कर परिवार के भरण-पोषण का जुगाड़ कर रहे हैं। जिले में बाल सुधार गृह व बाल संप्रेषण गृह न होने से श्रम विभाग बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के लिए छापा डालने से परहेज करता है। बाल मजदूरों को न्याय दिलाने को गठित न्यायालय बाल कल्याण समिति के प्रयासों पर जनप्रतिनिधियों व प्रशासनिक शिथिलता पानी फेर रही है।
जिले में वर्ष 2011 के सरकारी आंकड़ें देखें तो करीब 5000 बाल श्रमिक कठोर मेहनत व मजदूरी कर अपना बचपन गवां रहे हैं जबकि वास्तविकता इससे अलग है। निजी संस्थाओं के आंकड़े बाल मजदूरों की संख्या करीब 50 हजार बता रहे हैं। पढ़ने-लिखने की नन्हीं सी उम्र में इन बच्चों के हाथों पर ढाबों में जूठी प्लेटें तो गैराज में हथौड़े व औजार देखे जा सकते हैं। शहर में ही संचालित नौ ढाबों में सात से 14 वर्ष तक के बच्चे दिनोंरात काम करते मिल जाएंगे। सुबह व दोपहर पीठ पर बैग लादकर स्कूल आते-जाते बच्चों को देखकर खुद के जीवन को कोसते हैं। बचपन की आहुति दे रहे इन बच्चों तक तो न श्रम विभाग के हाथ पहुंच पा रहे हैं और नहीं प्रशासन को इनकी कोई सुध है। सर्व शिक्षा अभियान इन बच्चों के लिए बेमानी है। ढाबा संचालक सीधे परिजनों से संपर्क कर इन्हें अपने यहां काम पर लगा लेते हैं। अतर्रा रोड स्थित एक ढाबा में इसकी बानगी भी देखने को मिली। यहां काम कर रहे एक किशोर को यह तक नहीं पता उसकी कितनी दिहाड़ी है। उसने बताया कि होटल में उसे सिर्फ खाना मिलता है। उसकी दिहाड़ी माह में किसी दिन आकर मां ले जाती है। कमोवेश यही स्थिति यहां काम कर रहे चार अन्य बाल मजदूरों की है। होटल मालिक से सहमे बाल श्रमिक नजर बचाकर बताते हैं कि वे पढ़ना चाहते हैं पर चाहकर भी इस नरक से छुटकारा नहीं पा सकते।
बचपन बचाओ संस्था के संचालक महेंद्र सिंह बताते हैं कि ढाबों व होटलों से मुक्त कराने के बाद इन्हें बाल न्यायालय में पेश किया जाता है। जिले में बाल सुधार गृह व बाल संप्रेषण गृह न होने की वजह से इन्हें ललितपुर या कानपुर के बाल सुधारगृह में भेजना पड़ता है। इसमें कोई बजट नहीं मिलने की वजह से ट्रांसपोर्ट की दिक्कत आती है।
इसके साथ ही बंधुआ मजदूरी पर अंकुश लगाने के लिए जनप्रतिनिधि चुनाव लड़ते समय शपथ लेते हैं और सांसद व विधायक बनने के बाद इसे विस्मृत कर देते हैं। प्रशासनिक अमला इसे लेकर संजीदा नहीं है।
उधर स्टूडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन आफ इंडिया ने भी इस संबंध में डीएम को ज्ञापन सौंपा है। संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बृजेश मिश्रा, रवि चौधरी, शोएब आलम, शालू, गुड्डू, छोटे, आरिफ, असिद, गोलू, आजिम, मुरली आदि ने बाल श्रमिकों का शोषण करने वाले प्रतिष्ठान मालिकों व बेसिक शिक्षा विभाग की शिथिलता के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
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