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‘हमरे बिना गऊवां के ख्याल रखिह’

Ballia

Updated Thu, 11 Oct 2012 12:00 PM IST
सुरेमनपुर। त्रिवेदी आयोग की सिफारिशों के तहत यूपी और बिहार के नामांकन के बाद लोकनायक का पैतृक गांव सिताबदियारा दो हिस्सों में बंट गया। लेकिन जेपी ने भावनात्मक तौर से इसे स्वीकार नहीं किया। जेपी जब भी सिताबिदयारा जाते गांव के सभी टोलों के लोगों का एक बरगद के नीचे जमावड़ा लगता। जेपी के न रहने पर चंद्रशेखर ने टोले के लोगों को भावनात्मक तौर से बिखरने नहीं दिया और दोनों राज्यों में बंटे गांव के लोगों के साथ जेपी की जयंती एक मंच पर ही मनाते थे। पर चंद्रशेखर के न रहने के बाद से जेपी के गांव के लोग उनकी जयंती भी दो अलग-अलग स्थानों पर मनाने लगे हैं। एक बलिया के जयप्रकाश नगर (यूपी) में और दूसरा बिहार के चैन छपरा स्थित क्रांति मैदान पर।
कभी सिताबदियारा 27 टोलों का गांव हुआ करता था। इसी के अंतर्गत लाला का टोला और जेपीनगर भी आते हैं। पर 1970 में त्रिवेदी आयोग की सिफारिशों के अमल में आने के बाद यह टोले विभाजित हो गए और लोकनायक जयप्रकाश नारायण की इच्छा के खिलाफ उनका पैतृक गांव दो भागों में बंट गया। जेपी ने जिंदा रहते अपने गांव के लोगों को दो खेमों में नहीं बंटने दिया। उनके न रहने पर चंद्रशेखर की अगुवाई में जेपी नगर व लाला के टोला के लोग एक मंच पर ही उनकी जयंती मनाते थे। चंद्रशेखर के निधन के बाद यह परंपरा टूट गई और जेपी की जयंती दो जगह मनाई जाने लगी। करीब पांच साल से इस जयंती को दो मंचों पर मनाया जा रहा है।
1970 में हुए सीमांकन के बाद ग्राम पंचायत सिताब दियारा और ग्राम पंचायत प्रभुनाथनगर बिहार राज्य में शामिल कर दिया गए। शेष भाग को यूपी में रहने दिया गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण कभी बिहार यूपी के झंझावत नहीं फंसे। जब भी गांव आते और गांव के विभाजन का जिक्र होता तब वह लोगों से कहते थे कि ‘जब तक हम जियब, तबले इ काम ना होई। हमरा मुअला के बाद सब काम होई।’ सन् 1977 जब अंतिम बार सिताब दियारा जयप्रकाश नगर ट्रस्ट पर तीन दिन रुकने के बाद जाने लगे तो कार के ड्राइवर से कहा कि एक बार पूरे क्षेत्र को चक्कर लगाकर दिखा दो। स्थानीय लोग बताते हैं कि उसी समय उन्होंने चंद्रशेखर से कहा कि ‘हमरे बिना गऊवां के ख्याल रखिह’। चंद्रशेखर ने तभी से सिताबदियारा को अपना लिया और जीते रहते भरपूर विकास करवाया। पर चंद्रशेखर के न रहने के बाद न सिताब दियारा का विकास रुक गया बल्कि लोकनायक की जयंती दो स्थानों पर मनने लगी।
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