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योग मार्गों से परमधाम की प्राप्ति

Ballia

Updated Tue, 09 Oct 2012 12:00 PM IST
बिल्थरारोड। श्री वनखंडीनाथ (श्रीनागेश्वनानाथ महादेव) मठ सेवा संस्थान के तत्वावधान में चल रहे 68 दिवसीय रुद्राभिषेक और सत्संग प्रवचन में तपोनिष्ठ स्वामी श्री ईश्वरदास ब्रह्मचारी ने योग के महत्व को प्रतिपादित किया। उन्होेंने कहा कि भवसागर से तरन की युक्ति का सामान योग है।
श्री स्वामी ने कहा कि योग का अर्थ है जोड़ना, जो भी अपने आप को परब्रह्म परमात्मा से जोड़ना चाहता है, वह योग साधक कालांतर में योगी कहलाता है। योग दो प्रकार के होते हैं, सांख्य योग और कर्मयोग। कर्मयोग को निष्काम कर्म योग के नाम से जाना जाता है। दोनों ही योग मार्गों से परमधाम की प्राप्ति हो सकती है। परमात्मा शिव ने दोनों का समान फल बताया है। ये दोनों युक्तियां जिज्ञासु पर निर्भर करती है। अलग-अलग मतानुसार किसी को योग यानी कर्म योग सरल है, तो किसी को ज्ञान योग। ज्ञान के मार्ग में सत्य ज्ञान आवश्यक है, जबकि सरल योग के लिए तप, जप, आसन और प्राणायाम की जरूरत होती है। योगी शरीर के अभिमान से रहित हैं, फिर योग ज्ञान के बिना भी गुरु कृपा से मुक्ति मिल जाती है। जीव रूपी मृग भोगों की रमण्ीयता पर मुग्ध होकर उन्हें भोगने की लालसा और तृष्णा से नरक आदि की असह्रदय यातनाएं सहता है। इस प्रकार लाल मिर्च सुंदर व ग्राह्य लगता है। इसी प्रकार माया रूपी संसार सुखदायी होता है। माया के भंवर में जीव परमात्मा को भूल जाता है। माया कुछ भी नहीं है, जिसका अस्तित्व ही नहीं है, उसी का नाम माया है। जो वस्तुहमें प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देती है, वह माया का ही रूप है। माया क्षणभंगुर है, जो शाश्वत सुख नहीं दे सकती। शाश्वत सुख सद्गुरु की कृपा से ही संभव है। बलिया से पधारी गायत्री शक्तिपीठ की विदूषी महामाता कंचन चौबे ने कहा कि जो माताएं अपने पुत्रों को वन में गुरु के सानिध्य के लिए भेज देते थी, वे धन्य थीं। लेकिन वर्तमान समय में माताओं में अज्ञानता भर गया है। आजकल की माताएं सुबह के समय बच्चों को गुडमार्निंग सीखाती हैं। वह लड़का अंग्रेजी बोलकर अंग्रेज बन सकता है, लेकिन वह आत्मिक सुख कभी नहीं दे सकता। यदि माताएं उनसे सुख की कल्पना करती हैं, तो उन्हें साष्टांग प्रणाम सीखाएं।
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