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सैकड़ों कटान पीड़ितों का अमन चैन गंगा-घाघरा में समाहित

Ballia

Updated Wed, 26 Sep 2012 12:00 PM IST
बैरिया / बांसडीह। अंग्रेजी हुकमतों को उखाड़ फेंकने में द्वाबावासियों की अग्रणी भूमिका रही है। आजादी के दीवानों ने नहीं सोचा होगा कि द्वाबा के लोग बाढ़, आग व चहुंमुखी विकास के लिए इस कदर छटपटाएंगे। वर्तमान में आलम यह है कि सैकड़ों कटान पीड़ित गंगा व घाघरा की लहरों से अपना अमन चैन खो रहे हैं। आजादी के बाद से ही गंगा व घाघरा ने द्वाबा के किसी न किसी गांव का इतिहास व भूगोल निश्चित बदला है।
गंगा की लहरों में जिन गांवों का इतिहास बदला है उनमें शाहपुर, गंगौली, पचरुखिया, मझौंवा, रिकनी छपरा, दुर्जनपुर, मीनापुर आदि गांव गंगा की लहरों में समाहित हो गई। प्रशासन ने बड़े पैमाने पर अरबों रुपये खर्च कर राष्ट्रीय राज्यमार्ग-31 व टीएस बंधे को बचाने में लगी रही। गंगा की तरह घाघरा भी कदम दर कदम तबाही की दास्तां लिखती रही। आज के हालात ऐसे हैं कि इतने खर्च के बावजूद भी न तो गांवों को बचाया जा सका और नहीं एनएच-31 व टीएस बंधे की मुश्किलें कम की जा सकीं। करीब आधा दर्जन प्रतिनिधियों को आजादी के बाद से अब तक द्वाबा के लोगों ने अपना स्नेह व सहयोग के साथ आशीर्वाद दिया। लेकिन द्वाबा के लोगों को मूलभूत सुविधाएं (सड़क, बिजली, पानी) नहीं मिल सकीं।
बांसडीह संवाददाता के अनुसार दियरांचल इलाके में घाघरा नदी के वेग ने प्रत्येक वर्ष तबाही की दास्तान लिखी है। इस वर्ष भी दियरांचल क्षेत्र में घाघरा ने अपना कहर बरपाना शुरू कर दिया। जिससे क्षेत्र के दर्जनों गांव समेत 22 सौ हेक्टेयर फसल इसकी जद में आकर नष्ट हो गई। इसको लेकर दियरांचल के लोगाें में भुखमरी की नौबत उत्पन्न हो गई है। दियरांचल इलाके में घाघरा नदी के बाढ़ ने करीब 56 गांवों को अपनी जद में ले लिया है। वहीं दर्जनों गांव बुरी तरीके से बाढ़ में फंस गए हैं। उस गांव के लोग किसी भी तरीके से अपनी जान बचाव कर टीएस बंधे पर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। आलम यह है कि कभी क्षेत्र दूध, दही समेत घी के लिए प्रसिद्ध आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। टीएस बंधे पर गुजारा कर रहे लोग आने वाले आगंतुकों की राह देख रहे हैं। शायद इस उम्मीद में कि लोग हमारी सहायता करेंगे निराशा ही हाथ लग रही है। दियरांचल के लोगों को दु:ख सहन करना नियति बन गई है।
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