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मुड़िकटवा : 106 अंग्रेज सैनिकों को मौत के घाट उतारा

Ballia

Updated Thu, 09 Aug 2012 12:00 PM IST
रेवती। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के नायक कुंवर सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध जब विद्रोह का बिगुल फूंका तो रेवतीवासियों ने बाबू कंवर सिंह का पीछा कर रही अंग्रेजी सेना के 106 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया और अंग्रेजों को भागने पर विवश कर दिया।
1857 के स्वतंत्रता समर का इतिहास प्रसिद्ध है। बिहार के जगदीशपुर निवासी बाबू कुंवर सिंह अंग्रेजों के शोषण और प्रताड़ना से यूं तो पहले से ही गुस्से में थे लेकिन पटना के मीर अली को फांसी दी गई तो 80 वर्षीय बूढ़े शेर कुंवर बाबू का गुस्सा चरम पर पहुंच गया। गजेटियर, जनश्रुतियों एवं बाबू कुंवर सिंह पर लिखे काव्य तथा गद्य के वर्णनों के मुताबिक कुंवर सिंह के हृदय में अंग्रेजों की नाजायज वसूली एवं दादागिरी पहले से ही खलती थी। मीर अली के फांसी के बाद बाबू साहब अपनी सैन्य टुकड़ी लिए अंग्रेजों को ललकारते हुए मैदान में निकल पड़े। गोरी सेना उनपर काबू पाने के लिए पीछे लग गई। लड़ते-भिड़ते स्वतंत्रता का दीवानाआगे निकल रहा था। हवेली से निकलने के बाद आरा में कैप्टन डनवर, बीबीगंज और दुल्लौर में कैप्टर आयर, अतरौलिया में कैप्टन मित्रसेन, आजमगढ़ में कैप्टन डैम के नेतृत्व में उनकी लड़ाई जबरदस्त रही। अंग्रेजी सेना के काबू से बाहर रहे इस दीवाने ने अंग्रेजों को हर जगह छकाया। वे लड़ते हुए सीवान में घाघरा को पार कर शिवरामपुर घाट (बलिया) से पुन: बिहार में प्रवेश की योजना के साथ रेवती के पश्चिम होते हुए आगे बढ़ने लगे तो उनके ननिहाल सहतवार, रेवती, गायघाट तथा समीपवर्ती अन्य गांवों के लोगों ने पूर्व योजना बनाकर कुंवर सिंह को निर्बाध आगे बढ़ने के लिए आश्वस्त किया। रेवती के पश्चिम एवं गायघाट के उत्तर स्थित विस्तृत झुरमुट से सैकड़ों लोगों ने अंग्रेजी सेना पर ध्यान लगाकर बांस के नुकीले खपचार, भाले, तथा तलवार से हमला बोल दिया। परिणामत: 22 अप्रैल 1857 के इस हमले में 106 सैनिक को मौत के घाट उतार दिया गया। अचानक हुए हमले से जहां अग्रेंजी सेना के सैनिक भाग खड़े हुए वहीं कुंवर सिंह को आगे निकलने में काफी मदद मिली। तब से इसे मुड़िकटवा गांव के नाम से जाना जाता है। बाद में अंग्रेजों ने क्षेत्रीय लोगों को तमाम यातनाएं दीं। किंतु मुड़िकटवा देश के स्वतंत्रता के इतिहास में एक अमिट संस्था बना लिया।
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