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पिया बिन मनवा तरसे ना...

Ballia

Updated Mon, 16 Jul 2012 12:00 PM IST
दयाछपरा। आधुनिकता जीवन शैली ने भारतीय सभ्यता व समाज को ही नहीं बदला बल्कि परंपराओं को भी प्रभावित किया। यहीं नहीं कई परंपराएं तो विलुप्त हो गईं, जिसमें कजरी महत्वपूर्ण है। सदियों से गाई जाने वाली कजरी के बोल कहीं सुनाई नहीं पड़ रहे हैं और न ही कहीं झूले दिखाई पड़ रहे हैं।
करीब दो दशक पहले गांव घर की नई-नवेली दुल्हनों एवं लड़कियों को सावन माह का खासा इंतजार रहता था। सावन चढ़ते ही घर के धरन व पेड़ की डाली में झूला लगा ननद-भौजाई झूला झूलती थीं और इस झूले के साथ ही साथ शृंगार एवं वियोग रस से भरी कजरी ‘सखी रे जब-जब सावन बरसे, पिया बिन मनवा तरसे ना’, ‘पिया मेहंदी मंगा द मोती झील से जाके साइकिल से ना’, ‘हरि-हरि कृष्ण बनेलें मनिहारिन, पहिन ले लें साड़ी ए हरी’ आदि कजरी गाया करती थीं। सावन माह में हर तरफ कजरी के बोल सुनाई पड़ जाते थे। जिस प्रकार मधुमास में कोयल की बोली कर्ण प्रिय लगती है। उसी प्रकार कजरी पूर्व में कर्ण प्रिय गीत हुआ करता था। लेकिन बदलते परिवेश में झूला एवं कजरी गायन बीते जमाने की बात हो गई है। स्थानीय ग्रामसभा निवासी 89 वर्षीय बुजुर्ग महिला मोती बुआ का कहना है कि झूला, कजरी केवल गायन ही नहीं आपसी प्रेम को भी दर्शाता था। मुहल्ले की सभी लड़कियां बिना किसी भेदभाव का एक साथ झूला झूलती और कजरी गाती थीं। उस समय ऊंच-नीच, अमीर-गरीब के बीच कोई भेदभाव नहीं था। सब में एक प्रेम था, अपनत्व था, लेकिन कजरी के साथ ही प्रेम का अभाव हो गया है। टेंगरहीं निवासी गुड़िया सिंह का कहना है कि सावन में ही स्कूल खुल जाते हैं। बच्चों की पढ़ाई व घर के कामों से फुर्सत ही नहीं मिलती झूला कहां से झूला जाए। लुटईपुर निवासी सुमित्रा मिश्रा का कहना है कि ननद-भौजाई में प्रेम व लगाव था, लेकिन आज ननद-भौजाई के रिश्ते नदी के दो पाट बन गए हैं। अब टीवी, सीडी और मोबाइल से ही गीत का आनंद लिया जा रहा है। ऐसे में झूला व कजरी में समय बर्बाद क्यों किया जाए? उस समय का सदुपयोग घर के अन्य कामों में किया जा सकता है।
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