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मानसून की सुगबुगाहट पर गहराई चिंता की लकीरें

Ballia

Updated Sun, 10 Jun 2012 12:00 PM IST
रेवती। मानसून के अग्रदूत आकाश में दस्तक देने लगे हैं। गर्मी अपने चरम पर है। घाघरा नदी का पानी अपने बढ़ाव पर है। बढ़ी हुई नदी पूरे क्षेत्र के लिए बाढ़ का सुरक्षा कवच बने टीएस बंधे को निशाने पर लेने वाली है। उधर सरकारी अमले द्वारा लगातार भरोसा दिलाया जा रहा है कि टीएस बंधा किसी भी कीमत पर टूटने नहीं दिया जाएगा। जबकि टीएस बंधे पर हो रहे कार्यों में बरती जा रही उदासीनता तथा मानक के विपरीत किए जा रहे कार्य तटवर्ती ग्रामीणों को चिंतित किए हुए हैं। बंधे के इर्द-गिर्द के ग्रामीणों का कथन है कि जिस ढंग से निरोधक कार्य किए जा रहे हैं, उससे बंधा के बचने की संभावना बहुत ही कम है।
गंगा दशहरा से घाघरा की पानी में बढ़ोत्तरी जारी है। तट वासियों के मुताबिक नदी अपने सामान्य अवस्था से तीन फीट बढ़ी है। बीते दो जून को बंधा पर आए लोक निर्माण एवं सिंचाई मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने सिंचाई विभाग के आला अधिकारियों को आदेश दिया था कि 27 करोड़ में से 14 करोड़ रुपये अवमुक्त किए जा चुके हैं। ऐसे में रणनीति बनाकर युद्धस्तर पर काम करते हुए 15 दिनों के अंदर निरोधात्मक कार्य पूरे कर लिए जाएं। तभी से बंधे पर काम की गहमा-गहमी है। लगभग एक महीने पहले सांसद नीरज शेखर के साथ सिंचाई विभाग के पधारे अधिकारियों ने बताया था कि इसबार कटान अवरोधी के रूप में जीओ कैरेट बैग इस्तेमाल किए जाएंगे। ये बैग कटान रोकने में सर्वाधिक सफल हैं। बावजूद इसके, बंधे पर पुरानी तथा साधारण सीमेंट के खाद की बोरियां इस्तेमाल की जा रही हैं। ग्राम वासियों के मुताबिक किसी बोरी में आधा तथा किसी में तिहाई बालू भरकर बंधा के नीचे नदी की तरफ डाला जा रहा है। ग्रामीणों का कथन है कि बोल्डर परक्यूपाइन का इस्तेमाल करने के बाद भी जब नदी के कटान से निजात नहीं पाया जा सका तो पुरानी तथा सड़ी बोरियां नदी के तेवर के समक्ष कितने देर तक टिकेंगी। ग्रामीण बताते हैं कि अलबत्ता कुछ नई बोरियां आई हैं। लेकिन ये भी सीमेंट की हैं तथा दोनों तरफ से खुली हुई हैं। ग्रामीणों को संदेह है कि सुतली से बांधने या फिर सिलने के बाद बोरियों का मुंह पानी में कुछ दिनों के बाद ही खुल जाएगा। ऐसे में बंधे के बचाव कार्य पर किया जाने वाला खर्च बेअसर सिद्ध होगा।
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