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बैरिया सर्किल में बढ़ा अपराध का ग्राफ

Ballia

Updated Fri, 11 May 2012 12:00 PM IST
सुरेमनपुर। बैरिया सर्किल क्षेत्र में भले ही पुलिस अपराधियों पर अंकुश लगाने की बात करे, लेकिन यहां आए दिन अपराधी वारदात को अंजाम देकर निकल जाते हैं। सोचने वाली बात तो यह है कि छोटे-मोटे ही नहीं कई संगीन मामलों में भी पुलिस मुकदमा दर्ज करने से कतराती है। जिससे पीड़ित 156(3) के अंतर्गत न्यायालय की शरण में जाने को बाध्य होते हैं। अधिकतर मामलों में पुलिस एफआईआर की जगह एनसीआर लिख पल्ला झाड़ लेती है। इससे पीड़ित को उचित न्याय नहीं मिल पाता है।
गौरतलब है कि बैरिया सर्किल में कुल चार थाने हैं। इन थानों में जनवरी से अब तक 456 एफआईआर और 135 एनसीआर दर्ज हुए हैं। बैरिया थाने में 176 एफआईआर, 46 एनसीआर, दोकटी थाने में 34 एनसीआर और 46 एफआईआर, हल्दी थाने में 32 एफआईआर और 40 एनसीआर, रेवती थाने में 23 एनसीआर और 202 एफआईआर दर्ज हुए हैं। 80 पीड़ितों ने एनसीआर को 155 (2) के अंतर्गत न्यायालय से विवेचना का आदेश कराया है। जबकि 55 पीड़ितों ने एनसीआर को ही एफआईआर मान चुपचाप घर बैठ गए हैं। मुकदमा दर्ज नहीं होने के कारण 156 (3) के अंतर्गत न्यायालय से गुहार लगाया है। बैरिया तहसील क्षेत्र की दो बड़ी बारदातों पर गौर किया जाए तो पिछले नौ मार्च को अबीर लगाने की बात को लेकर बैरिया थानांतर्गत हेमंतपुर में पूर्व प्रधान योगेंद्र सिंह के दमाद रामाशीष सिंह की हत्या हो गई थी। जबकि दोनों पक्ष के अन्य तीन लोग गोली लगने से घायल हुए थे। तीन मई 2012 को रेवती थाना क्षेत्र के गोपाल नगर में झाड़फूंक की बात को लेकर हीरा बिंद समेत दो की मौत हुई और दर्जनभर लोग घायल हुए। फौजदारी न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश तिवारी ने कहा कि पीड़ित पीड़ित की तहरीर पर प्रथम दृष्ट्या पुलिस को एफआईआर दर्ज कर लेना चाहिए। विवेचना के दौरान सत्यता की जांच कर चार्जशीट या फाइनल रिपोर्ट लगाना चाएिह। अधिवक्ता मृत्युंजय पांडेय ने कहा कि गंभीर चोट के बाद पुलिस एनसीआर दर्ज कर पीछा छुड़ा लेती है। कुछ मामलों में मुकदमा दर्ज भी नहीं किया जाता। बाध्य होकर पीड़ित न्यायालय की शरण में पहुंचा है जिससे अधिवक्ताओं द्वारा न्यायालय से न्याय दिलाया जाता है। उधर, बैरिया क्षेत्राधिकारी आलोक कुमार जायसवाल ने कहा कि पीड़ितों का मुकदमा थाने में जरूर लिखा जाता है, पीड़ित किस वजह से 156 (3) के अंतर्गत न्यायालय गए ये तो पीड़ित ही बता सकता है। यह सच है कि न्यायालय से मुकदमा पंजिकृत कर विवेचना किया जाता है तो बहुत सारे मामले सत्य पाए जाते है। जिसमें पुलिस द्वारा चार्जशीट लगाई जाती है, लेकिन कुछ मुकदमे गलत पाए जाते है तो उसमें पुलिस फाइनल रिपोर्ट लगा देती है।
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