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बिना अपराध बैरक में बेबस बचपन

Bahraich

Updated Mon, 10 Dec 2012 05:30 AM IST
बहराइच। दुनिया जहान की चिंता से बेफिक्र गली मोहल्लों में कुलांचे भरने वाला बचपन जिला जेल की बैरक में बेबस है। न खेल के साजो-समान हैं और न संगी साथियों का मेल। सख्त बिछौने आंखों से नींद छीन लेते हैं। वहीं, बड़ी-बड़ी दीवारें व डरावने कैदियों के चेहरे दहशत भरने का काम कर रहे हैं। ऐसे में जब उन्हें गली-मोहल्ले, घर व संगी-साथी याद आते हैं तो मन छटपटा उठता है। सवालों पर मां की चुप्पी उन्हें अखरती है। ये मार्मिक दास्तां उन मासूमों की है जिन्हें बेरहम हालात ने ‘कैदी’ बना दिया। अपनी मां के साथ वे बिना किसी अपराध के सजा काट रहे हैं। मासूमियत भरी इन बच्चों की आंखें मानवाधिकार से नहीं बल्कि समाज से अपना जवाब मांगती हैं।
जिला कारागार बहराइच ब्रिटिश काल के दौरान निर्मित किया गया था। यहां की बैरकों में 540 बंदियों को रखने की व्यवस्था है। वर्तमान में यहां सजायाफ्ता व विचाराधीन बंदियों को मिलाकर लगभग 11 सौ बंदी निरुद्ध हैं। वहीं, इंडो-नेपाल बार्डर से चरस लेकर आते समय भारतीय इलाके में पकड़ी गईं नेपाली 71 महिलाओं के साथ 14 बच्चे ऐसे हैं जो बिना किसी अपराध के जेल की सजा काट रहे हैं। ये बच्चे भी अपनी मां के कृत्यों के भागीदार बन बैठे। जेल पहुंचते ही इन बच्चों की चंचलता व भोलापन न जाने कहां गुम हो गई। जिस उम्र में इन्हें अपनी चंचलता व नटखटपन से लोगों को हंसाना व हंसना था, उस उम्र में इनकी मुस्कान जेल की चहारदीवारी में कैद होकर रह गई है। 14 बच्चों में शामिल रीता व दिनेश जब अपनी मां से अपने पिता के बारे में पूछते हैं तो मां की चुप्पी उन्हें अखरने लगती हैं, वहीं मां की आंखों में आंसू देख इन बच्चों की आंखें भी डबडबा जाती हैं। नन्हें मासूमों की भोली आंखें जेल की सलाखों के पार अपने पिता को तलाशती रहती है। जेल प्रशासन की ओर से इन बच्चों की देखभाल, शिक्षा-दीक्षा व खान-पान के विशेष इंतजाम किए जाते हैं लेकिन बच्चों को सब फीका लगता है। अंत में बस इतना ही कि भारतीय कानून के अनुसार महिला कैदी के साथ छह साल तक के बच्चे रह सकते हैं लेकिन सवाल यही है कि बिना किसी अपराध के सजा काटते इन बच्चों का कोई मानवाधिकार नहीं है।
बंदियों के सापेक्ष नहीं बढ़ी अस्पताल की सुविधाएं
ब्रिटिश काल के दौरान स्थापित जिला कारागार में समय परिवर्तन के साथ बंदियों की संख्या बढ़ती गई लेकिन यहां के अस्पताल में सुविधाएं नहीं बढ़ सकी है। यहां मानकों के अनुरुप दो में से एक डॉक्टर व दो फार्मासिस्ट तैनात हैं और बीस बेड हैं। लेकिन संसाधनों की कमी बंदियों को साल रही है। इसके चलते अधिकतर बीमारियों में बंदियों को इलाज के लिए जिला अस्पताल ले जाना पड़ता है। वहीं महिला डॉक्टर तैनात न होने से महिलाओं के इलाज की सुविधा ही नहीं है। विगत जनवरी माह में जासूसी के केस में एक महिला समेत तीन चीनी नागरिक इसी जेल में रखे गए थे। चीनी महिला गर्भवती थी। उसने गर्भपात कराए जाने के लिए कोर्ट में याचिका दायर की थी। जेल में महिला डाक्टर न होने से उसे बार-बार जिला महिला अस्पताल ले जाना पड़ता था।
पांच बच्चों को मिल रही है शिक्षा
जिला कारागार में अपनी मां के साथ निरुद्ध 14 बच्चों में से पांच बच्चों को जेल प्रशासन की ओर से एक निजी विद्यालय में शिक्षा प्रदान कराई जा रही है। बच्चों को स्कूल लाने व ले जाने के लिए एक कर्मचारी को जिम्मेदारी दी गई है। अध्ययनरत इन पांच बच्चों की शिक्षा का खर्च जेल प्रशासन स्वयं वहन कर रहा है।
बच्चों की शिक्षा व खान पान का विशेष ध्यान
जिला कारागार के जेलर अभिराम मणि त्रिपाठी ने बताया कि जेल में निरुद्ध महिलाओं के साथ रह रहे बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए दूध मुहैया कराया जाता है। उन्होंने कहा कि जो बच्चे स्वेच्छा से पढ़ाई करना चाहते हैं उनका स्थानीय एक निजी विद्यालय में भेजा जाता है। शिक्षा विभाग उनकी परीक्षा
लेता है।
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