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भगवान बुद्ध के पदचिह्नों पर लापरवाही की परत

Bahraich

Updated Sun, 02 Dec 2012 05:30 AM IST
कटरा (श्रावस्ती)। यहां भगवान बुद्ध ने तप कर श्रावस्ती की धरती को पावन बना दिया। तमाम देशों के बौद्ध अनुयायी पूजा-अर्चना करने के लिए आते हैं। समय-समय पर यहां विशेष आयोजन भी होते हैं। यही नहीं, भगवान राम के पुत्रों लव-कुश ने भी यहीं जन्म लिया। लेकिन पुरातत्व विभाग को इसकी महत्ता का बोध नहीं। आस्था की केंद्र यह तपोस्थली उपेक्षा का शिकार हो गई है। बौद्धकालीन दीवारें दरक गई हैं। तालाब गंदगी से पटे पड़े हैं। उदासीनता के कारण कहीं प्राचीन भारत के अवशेष लुप्त न हो जाएं।
बहराइच-बलरामपुर बौद्ध परिपथ पर स्थित श्रावस्ती के 18 एकड़ भूमि में फैला जेतवन विहार भगवान बुद्ध के क्रिया कलापों का साक्षी है। यहां प्रत्येक वर्ष बुद्धत्व की प्राप्ति के लिए हजारों की संख्या में देशी व विदेशी बौद्ध अनुयायी आते हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान बुद्ध ने सर्वाधिक वर्षावास का समय इसी स्थान पर बिताया था। यहां खोदाई में मिले मंदिर स्तूपों की श्रृंखला, मठ (इसमें गंधकुटि व कुटेर कुटि का नाम प्रमुख है) रखरखाव के अभाव में क्षतिग्रस्त होते जा रहे हैं। साथ ही, आनंद बोधिवृक्ष जिसे भगवान बुद्ध के शिष्य आनंद ने श्रीलंका से लाकर गंधकुटि व कोशांब कुटि के पूर्वोत्तर कोण पर स्थापित किया था, वह भी आज संरक्षण के अभाव में अपनी पहचान खोता जा रहा है। बताया जाता है कि प्राचीन श्रावस्ती में सहेट व महेट में दो प्रमुख नगर थे। उनका पुरावशेष पुरातत्व विभाग ने खोज निकाला है। अब प्राचीन पुरवशेषों की दीवारें ढहने की कगार पर हैं। जेतवन में खुदाई के दौरान निकले तालाब की सीढ़ियां जगह-जगह टूट रही हैं। तालाब गंदगी से पटा पड़ा है। पुरातत्व विभाग इन प्राचीन धरोहरों को सहेजने में ढिलाई बरत रहा है।
स्वच्छता और संरक्षा के लिए उठाया जाए कदम
श्रावस्ती में रहने वाले बौद्ध भिक्षु आनंद सागर बताते हैं कि विदेशों से भी बौद्ध अनुयायी भगवान बुद्ध के पदचिह्नों के दर्शन के लिए आते हैं। यहां की प्राचीन दीवारों पर लगी ईंट बौद्ध अनुयायियों के लिए अलग ही महत्व रखती हैं। इसके बाद भी यहां स्वच्छता एवं संरक्षा का अभाव है। वहीं, करुणा सागर व धम्म रतन कहते हैं कि विदेशों से आने वाले बौद्ध अनुयायियों के लिए श्रावस्ती की मिट्टी स्वर्ग के समान है। इसके संरक्षण के लिए सरकार को ध्यान देना चाहिए। भिक्षु संघरतन कहते हैं कि श्रावस्ती की पहचान भगवान बुद्ध से है लेकिन सरकार इस प्राचीन धरोहर को संजोए रखने में उदासीनता बरत रही है। वहीं, शीलरतन सहित स्थानीय निवासी जीतेंद्र, अजीत, अनंतराम, अरुणेंद्र आदि कहते हैं कि तीर्थ स्थली होने के कारण ही यहां के कई परिवारों की रोजी-रोटी चल रही है।
बजट के अनुसार किया जा रहा संरक्षण
पुरातत्व विभाग के संरक्षण सहायक उदित नारायण तिवारी बताते हैं कि जितना बजट मिलता है, उसके अनुसार संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। यहां आने वाले बौद्ध अनुयायियों को कोई दिक्कत न हो, इसका प्रयास किया जाता है।
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