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बालिका वधू.... बस अब और नहीं

Baghpat

Updated Tue, 30 Oct 2012 12:00 PM IST
बागपत। छोटी सी उमर परनाई ओ बबासा, काई थारो करो मैं कसूर ? .... मासूम बेटियों को अपने बाबुल से यह सवाल शायद अब ना करना पड़े। गुड़ियों से खेलने की उम्र में बच्चियों को डोली में बिठाकर विदा करने की पुरानी परंपरा खत्म हो रही है। आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में छह साल पहले तक 39.2 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में कर दी जाती थी, अब बाल विवाह 8.9 फीसदी रह गए हैं। बागपत जैसे पिछड़े जिले में भी बालिका वधु 20 प्रतिशत तक कम हो गईं हैं।
जनगणना - 2011 के जारी किए गए आंकड़ों में बाल विवाह पर भी फोकस किया गया है। इसमें एक ओर 2007 से 2009 के बीच हुई नाबालिग बेटियों की शादी के आंकड़े हैं। इसके लिए 20-24 साल की शादीशुदा महिलाओं से उनकी शादी की उम्र के बारे में पूछा गया था। दोनों की तुलना से तस्वीर साफ हो जाती है। प्रदेश में लड़कियों के बाल विवाह 39.2 से घटकर 8.9 रह गए। इसका मतलब ये है कि पहले 100 में से 40 लड़कियों की शादी कम उम्र में की जा रही थी, अब नौ रह गई है।
इसकी तीन बड़ी वजह मानी जा रहीं हैं। एक तो साक्षरता बढ़ने के साथ-साथ समाज की सोच बदल रही है। दूसरा पहले के मुकाबले आज के अभिभावक बच्चों के करियर पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। तीसरा, पहले छोटी उम्र में शादी करके पांच-छह साल तक का गौना हो जाता था, लेकिन नई पीढ़ी को इस तरह की रस्म मंजूर नहीं। नतीजा आंकड़ों में सामने आ रहा है। बिजनौर में बाल विवाह 12.9 से घटकर 3.2, गाजियाबाद में 27.8 से 3.3, गौतमबुद्ध नगर में 35.4 से 7.9, मेरठ में 29.9 से 6.8, सहारनपुर में 50.8 से 12.8 प्रतिशत रह गए हैं। इन आंकड़ों में ये भी बताया गया है कि प्रदेश में महिलाओं की शादी की औसत आयु 21 वर्ष और पुरुषों की आयु 23.7 वर्ष है।
पहले लोगों में जागरूकता कम थी। बाल विवाह लड़की के जीवन में आने वाली परेशानियों को नहीं जानते थे। जैसे-जैसे साक्षरता बढ़ रही है, वैसे वैसे यह कुरीति कम हो रही है।
- डा. विद्योतमा प्रोफेसर मनोविज्ञान, एसपीआरसी डिग्री कॉलेज )
पहले शिक्षा की कमी के चलते समाज में कुरीतियां हावी थीं, बाल विवाह कानून के बारे में लोग नहीं जानते थे। अब जागरूकता बढ़ रही है। यह इसी का परिणाम है।
राज लक्ष्मी, प्रोफेसर समाजशास्त्र, एसपीआरसी डिग्री कॉलेज
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