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‘बहार आए तो सलाम कह देना’ अब भी यादों में

Azamgarh

Updated Wed, 09 May 2012 12:00 PM IST
मेजवां। ‘आज अंधेरा मेरी नस-नस में उतर जाएगा, आंखे बुझ जाएगी, बुझ जाएगा एहसासे शऊर’ यह पंक्तियां किसी उर्दू के मशहूर शायर कैफी आजमी के हैं। दिवंगत शायर कैफी आजमी की पुण्यतिथि उनके पैतृक गांव मेजवां स्थित ‘फतेह मंजिल’ पर दस मई को मनाई जाएगी।
उर्दू के मशहूर शायर कैफी आजमी का जन्म फूलपुर से सटे मेजवां गांव में 14 जनवरी 1919 को हुआ था। उनका निधन दस वर्ष पूर्व मुंबई स्थित यशलोक हास्पिटल में हुआ था। वर्ष 1973 में जब कैफी आजमी को फालिज का असर हुआ तो उन्होंने उक्त पंक्तियां लिख डाली। कैफी ने बालक-बालिकाओं के लिए 1979-80 में प्राइमरी स्कूल की स्थापना किया और आज उच्चशिक्षा के लिए कैफी आजमी सिलाई चिकनकारी और कम्प्युटर शिक्षा के लिए संस्थाना की स्थापना खुद अपने जीवनकाल में किया। 1981-82 में फूलपुर मुख्यमार्ग से मेजवां गांव तक पिच मार्ग का निर्माण कराया। शिक्षा क्षेत्र के विकास के लिए सदैव प्रयास करने वाले कैफी ने सन् 1994 में मिजवां वेलफेयर सोसायटी के नाम से संस्था की स्थापना किया। कैफी ने सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भी भाग लिया। उन्होंने 11 वर्ष की उम्र से ही गजल लिखना शुरू कर दिया था। भारत की आजादी के बाद जिन लेखकों और शायरों ने अपनी लेखनी और कर्म से सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन खड़ा किया, कैफी उन चंद लोगों में खास थे। उन्होंने शायरी के जरिए दुनिया में अपनी पहचान बनाई। तो अपने जीवन के आखिरी बीस वर्षों में वो अपनी जन्मस्थली मेजवां में रहकर गांव के उत्तरोत्तर विकास के लिए संघर्ष करते रहे। कैफी आजमी खास शायर थे। उर्दू के प्रति बेहद भावुक थे। जिसकी उपेक्षा के विरुद्ध उन्होंने पदमश्री पुरस्कार वापस कर दिया। वह उर्दू को धर्म से जोड़ने के खिलाफ थे, आजीवन लिखकर और बोलकर प्रतिरोध करते थे। 1943 में उन्होंने भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की उर्दू पत्रिका कौमी जंग में कुछ समय तक काम किया। इसके बाद उन्हाेंने प्रसिद्ध नाट्यकर्मी शौकत को शरीके हयात बनाया। फिल्मों में गीत जीवन यापन के लिए लिखा। 1988 में शहीद लतीफ की पहली फिल्म ‘बुजदिल’ थी। इसके अलावा शमा, कागज के फूल, हकीकत, पाकीजा, हंसते जख्म, मंथन, शगुन, हिंदोस्तान की कसम, नौनिहाल, नसीब, फिर तेरी कहानी याद आई और तमन्ना सहित कई फिल्मों में उनके लिखे गीतों ने लोकप्रियता के प्रतिमान रचे। कैफी ने गीतों की तरह दमदार कथा-पटकथा लेखन भी किया। उनका लिखा शेर ‘बहार आए तो सलाम कह देना कि आज तलब कर लिया है सहेरा ने’ जो आज भी चर्चित है। कैफी आजमी जीवन के अंतिम 20 वर्ष पैतृक गांव मेंजवा में रहकर सामाजिक सेवा से जुड़े रहे। दस मई 2002 को उन्होंने दुनियां को अलविदा कर दिया।
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