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मानसून आने में देरी से प्रभावित होगी पैदावार

Auraiya

Updated Sat, 07 Jul 2012 12:00 PM IST
मुरादगंज(औरैया)। आषाढ़ माह के मध्य तक बारिश न होने और सिंचाई के लिए पानी का इंतजाम न करने से जिले में सूखे जैसे हालात उत्पन्न हो गए हैं। हालांकि मानसून ने तीन जुलाई को जिले में दस्तक दे दी है। पर पानी की कमी ने जिले में खरीफ की फसल को प्रभावित कर दिया। मानसून 18 दिन देर से आने से खरीफ फसलों की पैदावार में कमी आने का अनुमान लगाया जा रहा है।
खरीफ 2012 में जिले में 5180 हेक्टेयर धान, 9400 हेक्टेयर मक्का, 4000 हेक्टेयर अरहर, 1621 हेक्टेयर उर्द व मूंग, 23,954 हेक्टेयर ज्वार एवं बाजरा तथा 251 हेक्टेयर भूभाग पर मूंगफली की बुवाई करने का लक्ष्य रखा गया है। वर्ष 2011 में 15 जून को मानसून ने जिले को पूरी तरह से ढक लिया था। इसके चलते खरीफ की फसलों का उत्पादन सामान्य से अच्छा ही रहा था। वहीं इस बार मानसून ने 18 दिन देरी से अपनी आमद दर्जकराई है। समय से मानसून के न आने और सिंचाई विभाग की आरे से नहरों, रजबहों, बंबों एवं माइनरों में पानी न छोड़ने से ज्यादातर किसानों ने धान की नर्सरी नहीं कर सके हैं। पानी के साधन से संपन्न किसानों ने नर्सरी की तो 48 डिग्री तापमान और कड़ी धूप से उनकी धान की नर्सरी को जला कर रख दिया। समय से पानी और नर्सरी न होने से धान की रोपाई भी देरी से की जाएगी। यही पंद्रह दिन की देरी किसानोें की किस्मत खोटी कर गई है। हाल ही में जिला प्रशासन की ओर से धान की नर्सरी की वास्तविक स्थिति के लिए सर्वेक्षण कराया गया। अकेले विकास खंड अछल्दा में ही किसानों की 30 से 40 फीसदी धान की नर्सरी बरबाद होने की रिपोर्ट का खुलासा किया गया है। ठीक यही स्थिति मक्का, अरहर, कुमेढ़ा, जुनरी, तिल, उर्द, मूंग बाजरा आदि फसलों के उत्पादन में मानसून ने खलल डाल दिया है। इस संबंध में उप कृषि निदेशक डा. बनारसी यादव कहते हैं कि जिन क्षेत्रों में धान की रोपाई नहीं की जा सकती है वहां के किसान हाइब्रिड मक्का बोकर कम लागत और मात्र सौ दिन में 52 से 55 कुतंल प्रति हेक्टेयर तक का उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने धान किसानों को सलाह देते हुए कहा कि पहले तो 35 दिन पुरानी नर्सरी काप्रयोग करने से बचें यदि ऐसा संभव न हो तो नर्सरी का ऊपरी भाग काटकर ही रोपाई करें। बचे हुए धान के खेत में तिल, मूंग, बाजरा की खेती करें।
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