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स्कूलों में चूल्हे ठंडे होने की कगार पर

Auraiya

Updated Mon, 17 Dec 2012 05:30 AM IST
फफूंद (औरैया)। ब्लाक भाग्यनगर क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में छह माह से कनवर्जन कास्ट का पैसा न मिलने से मिड डे मील के चूल्हे ठंडे होने की कगार पर हैं। हालांकि विद्यालयों के शिक्षक नौकरी जाने के डर से अपने जेब से मिड डे मील बनवाकर सरकारी योजना किसी तरह चला रहे हैं। इसके चलते ब्लाक क्षेत्र के कुछ स्कूल पैसे की किल्लत से बच्चों को सिर्फ चावल व सब्जी परोसकर एमडीएम के नाम पर खानापूरी कर रहे हैं।
परिषदीय विद्यालयों में बच्चों को खाना परोसने के लिए जुलाई से लेकर अब तक शिक्षकों को एक धेला भी नहीं दिया गया है। प्रधानाध्यापकों को खाना बनवाने के लिए गैस सिलेंडर तेरह सौ पचास रुपए में खरीदना पड़ रहा है। स्कूलों में बच्चों की संख्या को देखते हुए गैस सिलेंडर तीन चार दिन में समाप्त हो जाता है। इसके कारण शिक्षको को अपनी जेब से पैसा लगाकर महंगा सिलेंडर लेना भारी पड़ रहा है। जबकि सिलेंडर खरीदने के लिए उन्हें पैसा नहीं मिलता। कुछ विद्यालयों के शिक्षकों ने बताया विद्यालय में पंजीकृत 100 बच्चों पर मात्र 60 बच्चों के लिए कनवर्जन कास्ट का पैसा दिया जाता है। जबकि 40 बच्चों के लिए शिक्षकों को अपनी जेब से पैसा देकर मिड डे मील बनवाना पड़ता है। वहीं परिषदीय स्कूलों में बनने वाला मिड डे मील प्रधानाध्यापकों के लिए गले की फांस बना हुआ है। योजना को चलाने के लिए बजट का अभाव है। कमरतोड़ महंगाई की वजह से बजट के अभाव में मिडडेमील बनवाना शिक्षकों के आर्थिक और मानसिक मानसिक उत्पीड़न का अहम कारण बनता जा रहा है।
ब्लाक क्षेत्र के अध्कितर विद्यालयों में मिड डे मील योजना दम तोड़ती नजर आ रहे हैं। नौकरी बचाने के लिए कुछ शिक्षक अपने पास से मिडडेमील बनवाते हैं। मेन्यू के अनुसार प्रति दिन कभी रोटी सब्जी, तहरी, खीर, चावल आदि बनवाया जाता है। प्राथमिक विद्यालय व पूर्व माध्यमिक विद्यालय में शिक्षा विभाग की लापरवाही से शिक्षकों को छह माह से मिड डे मील के नाम पर एक पैसा नहीं दिया गया है। रसोईयों को भी मानदेय नहीं दिया गया है। इससे एक हजार रुपए मानदेय के सहारे परिवार पालने वाली रसोईयों के सामने दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा है। आर्थिक संकट से परेशान टीचर शासन व प्रशासन को कोसते नजर आ रहे हैं। बीएसए महेश चंद्र गुप्ता ने बताया ग्रांट आ गई है और सभी विद्यालयों में भेजी जा रही है।
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