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कर्ज माफी भी नहीं दे पाई किसानों को राहत

Auraiya

Updated Mon, 03 Dec 2012 05:30 AM IST
मुरादगंज(औरैया)। देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाला किसान अब प्रदेश सरकार की कर्जमाफी योजना से निराश हो चला है। किसानों का कहना है कि पिछले चार पांच सालों से सुरसा की तरह मुंह फैला रही महंगाई से जूझ रहे किसानों के मन में एक आस थी कि युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव किसानों के क्रेडिट कार्ड केे लिए गए ऋण को माफ कर देंगे। लेकिन वह भी छलावा साबित हो रही है।
कर्ज माफी सिर्फ छलावा
शहाब्दा निवासी राजेश चौबे कहते हैं कि कर्जमाफी योजना सरकार की किसानों के साथ छलावा है। इससे चंद किसानों का ही भला हो पाना संभव है।
कीमतों का अंतर से ही पिछडे़पन का कारण
रामप्रताप त्रिपाठी बताते हैं कि चाहे प्रकृति की मार हो या सरकार की दमनचक्र नीति। लेकिन अन्नदाता कष्ट को बराबर सहन करता चला आ रहा है। िपछले तीन सालों में खाद की कीमतें तो बढ़ी हैं, लेकिन उसके सापेक्ष आनज की कीमतों में इजाफा नहीं हुआ है। यही किसानों के पिछड़ेपन का कारण है।
बिचौलियों की व्यवस्था खत्म हो
क्षेत्र के चंदनापुर निवासी कृषक शिवपाल सिंह सिकरवार कहते हैं कि कर्जमाफी ही किसानों की समस्या का निदान नहीं है। बल्कि अनुचित कर भारों से मुक्त खाद बीज पानी तथा सस्तेदर पर कृषि यंत्र आदि मुहैया हों। इसके अलावा मंडियों में बिचौलियों की व्यवस्था भी समाप्त की जाए। ताकि किसानों को उसकी उपज का सही मूल्य मिल सके। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति तो सुधरेगी और पैदावार भी बढ़ेगी।
विकास की अंधी दौड़ा खेती को हानि पहुंचा रही है
पुर्वा उद्येत निवासी किसान देवीदयाल दोहरे बताते हैं कि विकास की अंधी दौड़ ने सबसे ज्यादा नुकसान खेती का ही हुआ है। उपजाऊ भूमि ही सड़कों संपर्क मार्गों, नहरों, चकरोड़ों, आवासों आदि में विभाजित हो रही है। जिससे उपजाऊ भूमि का रकवा सिकुड़ता जा रहा है। इससे क्षेत्र को भी नुकसान हो रहा है। वहीं किसान भी खराब आर्थिक स्थिति से जूझ रहे है।

बिजली समस्या भी किसानों पर भारी
बखरिया निवासी किसान विष्णुकांत पाठक बताते हैं कि किसानों की उपेक्षा करके सरकार का भला हो पाना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि शहाब्दा माइनर में पानी न आने तथा आनेपुर सब स्टेशन से पर्याप्त विद्युत आपूर्ति न होने तथा लो वोल्टेज के चलते इलाके के नलकूप बेकार साबित हो रहे हैं। हर बार जनप्रतिनिधि चुनाव के समय तो बड़े-बड़े वादे करते हैं। लेकिन जीतने के बाद किसानों के लिए कुछ भी नहीं किया जाता है।
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