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चाय की दुकान व ढाबों पर कार्य कर रहे किशोर

AmbedkarNagar

Updated Wed, 21 Nov 2012 12:00 PM IST
अंबेडकरनगर। जिन कोमल हाथों में कलम व किताबें होनी चाहिए, उन्हें लोगों के झूठे बर्तन थमा दिए गए हैं। विद्यालय में जाकर अन्य बच्चों के बीच बैठकर शिक्षा ग्रहण करने का सपना चाय व खाना बनाने की भट्ठी में ही घुटकर दम तोड़ रहा है। यह बातें पढ़ने व सुनने में कड़वी अवश्य लग रही हैं, लेकिन सच यही है। जिले में बालश्रम का कार्य धड़ल्ले से जारी है। चाय का होटल हो या फिर ढाबा। पंचर की हो या फिर कबाड़ी की दुकान। प्रत्येक स्थानों पर बालश्रम कानून की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बालश्रम को रोकने के लिए न प्रशासन गंभीर हो पा रहा है और न ही स्वयंसेवी संस्थाओं को ही इसकी कोई सुध है। कभी कभार इसके विरुद्ध आवाज उठाए जाने पर विभागीय अधिकारी अभियान चलाते हैं, लेकिन वह महज औपचारिकता तक ही सीमित रह जाता है। नतीजतन दुकानदारों द्वारा बच्चों से धड़ल्ले से काम लिया जा रहा है।
बालक-बालिकाओं के हाथों में कलम व पीठ पर बस्ता टांगने को लेकर विभागीय अधिकारी कितना गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तमाम चाय की दुकानों, ढाबों व पंचर की दुकानों पर किशोरों को कार्य करते देखा सकता है। इन होटलों व ढाबों पर कार्य करने वाले बालकों का विद्यालयों में जाना एक सपना ही बना हुआ है। इन बच्चों को पढ़ने की चाहत तो बहुत है, लेकिन मजबूरी, बेकसी व लाचारी उनके कदम रोक देती है।
मंगलवार को बालश्रम कानून का सच जानने के लिए जब ‘अमर उजाला’ की टीम निकली, तो कई स्थानों पर इसकी धज्जियां उड़ती दिखाई दीं। अकबरपुर टांडा मार्ग पर एक चाय के होटल पर लगभग 12 वर्ष के किशोर को को बुलाकर पूछा, तो बताया गया कि उसका नाम छोटू है। वह टांडा का रहने वाला है। पिता नि:शक्त हैं। घर में कोई और कमाने वाला नहीं है।
उसके सामने मजबूरी है, इसलिए वह काम कर रहा है। प्रतिदिन 50 रुपये मिल जाते हैं। कुरेदने पर बताया कि यदि कोई गिलास किसी वजह से टूट जाता है, तो मालिक की मार खाने के अलावा उसका पैसा भी काट लिया जाता है। अकबरपुर बसखारी मार्ग पर एक पेट्रोलपंप के निकट पंचर की दुकान पर साइकिल बनाने वाले रामकिशोर ने बताया कि दुकान पर कार्य करना उसकी मजबूरी है। वह अपने पिता का हाथ बंटाता है। बताया कि पिता कमजोर हो चुके हैं। इसलिए उनका हाथ बंटाना उसकी मजबूरी है। कहा कि कक्षा दो तक पढ़ाई की, इसके बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी।
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