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कम नहीं हुई मिट्टी के दीपकों के प्रति ललक

AmbedkarNagar

Updated Sat, 10 Nov 2012 12:00 PM IST
अंबेडकरनगर। आधुनिकता की चकाचौंध में अभी भी मिट्टी के दीपकों का महत्व बरकरार है। विभिन्न रंगों की झिलमिलाती झालरों के बीच दीयों से निकलती पीली रोशनी अपना एक अलग स्थान बनाए हुए है। न सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में, वरन शहरी क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में लोग दीपावली पर्व पर घरों को रोशन करने के लिए अभी भी दीयों का ही प्रयोग करते हैं। सस्ती झालरों की उपलब्धता के बावजूद दीयों की अभी भी अच्छी खासी मांग है। इसके चलते ही घूमती हुई चाक पर कुम्हारों के हाथ तेजी से चल रहे हैं। दीयों के प्रति लोगों की ललक का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दीपावली के एक सप्ताह पूर्व से ही इनकी बिक्री शुरू हो गई है।
13 नवंबर को मनाए जाने वाले दीपावली पर्व को लेकर लोगों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। घरों, दुकानों व प्रतिष्ठानों की विशेष सफाई व रंग-रोगन का दौर अंतिम चरण में है। पर्व के मद्देनजर घर को भव्य तरीके से सजाने व रोशनी के लिए भी लोगों ने तैयारियां प्रारंभ कर दी हैं। इसके लिए जहां रंग-बिरंगी झालरों की खरीदारी कर रहे हैं, वहीं मिट्टी के दीयों के प्रति भी लोगों की ललक बरकरार है। रंग-बिरंगी रोशनी वाली झालरों के बीच दीयों की पीली रोशनी अपना अलग स्थान बनाए हुए है। फेरी वाले साइकिल पर दीया भरे झाबे रखकर गली-गली बिक्री कर रहे हैं। मौजूदा समय में दीया 50 से 60 रुपये प्रति सैकड़ा की दर से बिक रहा है।
इंद्रलोक काॅलोनी की सत्यवती द्विवेदी ने बताया कि दीयों की रोशनी आंखों को ताजगी पहुंचाती है। जब भगवान राम अयोध्या पहुंचे तो अयोध्यावासियों ने घी के दीये जलाए थे। उसी परंपरा को हम सभी ने अभी भी कायम रखा है। शिक्षिका पूजा गौड़ ने कहा कि वह सदैव दीया से ही अपने घर को सजाती हैं। जो बात दीयों की रोशनी में है, वह झालरों में नहीं है। कहा कि हालांकि दीयों पर झालरों की अपेक्षा अधिक खर्च आता है लेकिन घर की खूबसूरती दीयों से ही बढ़ती है। किरन यादव ने कहा कि जब से उन्होंने होश संभाला है, तब से वे दीपावली पर्व पर दीयों का ही प्रयोग करती चली आ रही हैं। इस बार भी वह दीयों से ही अपने घर को सजाएंगी। कटरिया सम्मनपुर के कुम्हार राजाराम ने बताया कि चायनीज झालरों की मांग के बावजूद मिट्टी के दीयों का महत्व बना हुआ है। हालांकि पहले की अपेक्षा अब इसकी मांग में थोड़ी कमी आई है। निर्माण में भी पहले की अपेक्षा लागत अधिक आती है। निर्माण में लगने वाली मिट्टी अब कठिनाई से मिल रही है। सीहमई श्यामगंज के कुम्हार लल्लन प्रजापति ने बताया कि रंग-बिरंगी झालरों का चलन बीते कुछ वर्षों से काफी बढ़ गया है। इसका प्रतिकूल प्रभाव दीयों की बिक्री पर पड़ा है। बताया कि 10 से 12 हजार की लागत में वे प्रत्येक वर्ष दीये का निर्माण परिवार के सदस्यों के साथ करते हैं। इनकी बिक्री से 15 से 18 हजार रुपये मिल जाता है।
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