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प्रमाण पत्र देने के बाद प्रशासन ने नहीं ली सुध

AmbedkarNagar

Updated Sun, 12 Aug 2012 12:00 PM IST
जलालपुर। सेनानी आश्रित का प्रमाणपत्र थमाने के बाद प्रशासन अपनी जिम्मेदारी भूल गया। आजादी के आंदोलन में रेल पटरी उखाड़ने के जुर्म में लगभग एक वर्ष तक जेल में रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सुखई के परिजनों का दर्द यह है कि प्रशासन का कोई भी प्रतिनिधि उनका हाल जानने नहीं पहुंचता। बीपीएल श्रेणी के इस परिवार को हालांकि आश्रित का प्रमाण तो मिला है, लेकिन अन्य सुविधाएं नदारद हैं।
जलालपुर तहसील क्षेत्र के शेखूपुर गांव निवासी सुखाउ उर्फ सुखई ने स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था। 1914 में जन्में सुखई की मौत 65 वर्ष की उम्र में तब हुई थी, जब देश आजादी का जश्न कई बार मना चुका था। 1979 में जीवन की अंतिम सांस लेने वाले सुखई ने स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान 1942 में जाफरगंज रेलवे ट्रैक को क्षतिग्रस्त कर अंग्रेजों का आवागमन रोक दिया था। रेलवे के संचार माध्यम के लिए प्रयुक्त होने वाला तार भी काटने का आरोप उन पर लगा था। वे पकड़े गए तो सीना चौड़ाकर पुलिस कर्मियों के साथ जेल के लिए रवाना हो गए। बताया जाता है कि अकबरपुर के तमसा नदी पुल पर पहुंचने के बाद कुछ और सिपाहियों ने रोककर कारण जानना चाहा तो वे उनसे भी भिड़ गए। परिजनों के मुताबिक करीब एक वर्ष तक जेल में रहने वाले सुखई ने लोगों को सदैव देश प्रेम की सीख दी।
सुखई के चार पुत्रों में से राममिलन, रामकेवल व राजबहादुर का पूरा परिवार तो बाहर रहता है। गांव में सिर्फ एक पुत्र राजकरन ही परिवार के साथ जीवन गुजार रहे हैं। अमर उजाला को उन्होंने बताया कि प्रशासन के अधिकारी कभी भी उनकी सुध नहीं लेते। राजकरन ने बताया कि उनके घर तक पहुंचने के लिए एक क्षतिग्रस्त खड़ंजा मार्ग ही है। खड़ंजे को पिच मार्ग तक नहीं कराया गया। बताया कि उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित का प्रमाण पत्र तो मिला है, लेकिन अन्य कोई सुविधा नहीं मिल सकी। कच्चे घर में रह रहे राजकरन के लिए पक्की छत का प्रबंध करने की जिम्मेदारी प्रशासन महसूस नहीं कर पाया है। एक निजी विद्यालय में अध्यापन कर रहे राजकरन परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। बीपीएल श्रेणी में शुमार इस परिवार के लिए सरकार की योजनाएं बेमानी साबित हो रही हैं। परिवार के सदस्य बताते हैं कि स्वतंत्रता के 25 वर्ष पूरे होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सम्मानपूर्वक जो ताम्रपत्र दिया था, वह सुखई को भी मिला था। इसे अत्यंत सहेज कर रखा गया है।
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