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पूरे साल माध्यमिक स्कूलों में नहीं हुई पढ़ाई

Allahabad

Updated Fri, 24 Jan 2014 05:44 AM IST
इलाहाबाद। यूपी बोर्ड से जुड़े माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ाई-लिखाई का हाल खराब है। पूरे साल सरकार की ओर से जनशक्ति निर्धारण के नाम पर शिक्षकों के वेतन रोकने की कार्रवाई के चलते रहने के कारण पढ़ाई पटरी पर नहीं आ सकी। स्कूलों में हाईस्कूल और इंटरमीडिएट का एक तिहाई कोर्स भी पूरा नहीं हो सका है। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के साथ ही छोटी कक्षाओं में भी आधा कोर्स पूरा नहीं हो सका है। अभिभावकों का मानना है कि जब बच्चों की जड़ ही मजबूत नहीं होगी तो वह आगे कैसे पढ़ाई जारी रख सकेंगे। इन सबके बीच स्कूलों में शिक्षकों की कमी सबसे पढ़ाई-लिखाई में बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रही है।
प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों में एक ओर कई विद्यालयों में शिक्षकों और छात्रों के अनुपात को देखते हुए कुछ शिक्षकों को हटाने की बात की जा रही है तो दूसरी ओर प्रदेश सरकार उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड से नए शिक्षकों की भर्ती की जा रही है। शिक्षकों को हटाने और वेतन रोकने की प्रक्रिया के कारण इस चालू शैक्षिक सत्र में पढ़ाई-लिखाई पूरी नहीं हो सकी है। अकेले इलाहाबाद में ही 35 विद्यालयों में शिक्षकों कर्मचारियों का वेतन इस कारण रोक दिया कि उनके स्कूल में कुछ लोग अतिरिक्त हैं। विद्यालय में शिक्षकों का वेतन रोकने से पूरे वर्ष माध्यमिक शिक्षा में अराजकता की स्थिति रही।
प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ शर्मा गुट के शिक्षक नेता और विधायक सुरेश त्रिपाठी का कहना है कि जनशक्ति निर्धारण का मानक सही नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार 1971 और 1981 को आधार मानकर जनशक्ति तय कर रही है जबकि आज की स्थिति बदल गई है। उनका कहना है कि पूरे प्रदेश में शिक्षकों की कमी है। इस बात को सरकार नहीं देख रही है। इसे पूरा कर सरकार शिक्षा व्यवस्था में सुधार ला सकती है।
शिक्षकों की कमी से वित्तविहीन स्कूलों की खुली राह
प्रदेश के अशासकीय माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती न होने और पढ़ाई के गिरते स्तर से परेशान अभिभावक अब अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजने की अपेक्षा वित्तविहीन स्कूलों में भेज रहे हैं। इन स्कूलों में अधिक फीस देकर अभिभावक बच्चों को कम योग्य शिक्षकों के पास पढ़ने भेज रहे हैं। सवार्य इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. मुरारजी त्रिपाठी का कहना है कि शिक्षकों की कमी सरकार की प्लानिंग की वजह से बिगड़ी है। बच्चे और अभिभावक तो शिकायत करने पहुंचते परंतु वास्तविकता यही है कि भले ही से नौवीं से बारहवीं कक्षा तक के विद्यार्थी कोचिंग ट्यूशन से अपना कोर्स पूरा करकेसंतुष्ट हो रहे हैं लेकिन छोटी कक्षाओं छठीं से आठवीं तक के बच्चों की नींव कमजोर हो रही है। यही कारण है कि सरकारी स्कूलों से बच्चों का पलायन हो रहा है।
यूपी बोर्ड की ओर से बार-बार कोर्स रिविजन करने से अब दसवीं और बारहवीं का कोर्स सीमित हो गया है। पहले की अपेक्षा कोर्स कम होने से अब जल्दी पूरा हो जाता है। पूर्व प्रधानाचार्य कौशल किशोर त्रिपाठी का कहना है कि इस कारण से शिक्षक कम समय में ही कोर्स पूरा कर पा रहे हैं।
पहले के जमाने में गांव के बच्चे अच्छी शिक्षा के लिए शहर के स्कूलों में पढ़ने जाते थे। अब पैमाना बदल चुका है, बिना किसी मानक के खुले वित्तविहीन स्कूलों में अब शहर के बच्चे गांव में पढ़ने जा रहे हैं। ऐसा इन स्कूलों में नकल की अच्छी व्यवस्था और परीक्षा पास होने की गारंटी के कारण देखने को मिल रहा है। इससे भी अधिक अब तो दूसरे राज्यों के विद्यार्थी भी अपने यूपी बोर्ड से परीक्षा पास करने आ रहे हैं।
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