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बढ़ी लकड़ी की खपत तो बिगड़ेगी सेहत

Allahabad

Updated Fri, 28 Dec 2012 05:30 AM IST
इलाहाबाद। कुंभ में महंगी रसोई गैस न सिर्फ जेब बल्कि स्वास्थ्य पर भी भारी पड़ेगी। मेले में आने वाले लाखों कल्पवासियों को रसोई गैस पर सब्सिडी का लाभ नहीं मिलेगा। कल्पवासियों के लिए गैस सिलेंडर के लिए तीन गुना ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा। ऐसे में प्रशासन मानकर चल रहा है कि रसोई गैस की मांग कम होगी और लकड़ी की खपत बढ़ जाएगी। इसी के मद्देनजर प्रशासन ने इस बार दोगुनी लकड़ी मंगवाई है। लकड़ी की खपत बढ़ी तो पर्यावरण के साथ स्वास्थ्य के लिए भी घातक साबित होगा। मेला क्षेत्र में आने वाले श्रद्धालु हों या शहर के लोग, सब पर इसका खराब असर पड़ने की आशंका है।
अर्धकुंभ में तकरीबन दो हजार कुंतल लकड़ी का ऑर्डर दिया गया था लेकिन इस बार गैस महंगी होने पर प्रशासन ने चार हजार कुंतल लकड़ी मंगवाई है। हालांकि खुद कमिश्नर देवेश चतुर्वेदी भी मान रहे हैं कि लकड़ी का ज्यादा उपयोग पर्यावरण के साथ स्वास्थ्य के लिए भी ठीक नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजकर रसोई गैस पर सब्सिडी की मांग की है ताकि गैस सस्ती होने पर ज्यादा से ज्यादा कल्पवासी उसका उपयोग करें लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से अब तक कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला है। विशेषज्ञों ने ज्यादा लकड़ी जलाने के कई खतरे गिनाए हैं।
पर्यावरणविद् एवं मौसम विज्ञानी डॉ. एसएस ओझा के मुताबिक ठंड के मौसम में लकड़ी का ज्यादा उपयोग फेफड़े को जाम कर सकता है। मौसम में भारी नमी है। अनुमान है कि कुंभ के दौरान भी मेला क्षेत्र सहित पूरा शहर कोहरे की चादर से लिपटा रहेगा। ऐसे में लकड़ी जलने पर निकलने वाली गैस कोहरे से मिलने के बाद और खतरनाक बन जाएगी।
पर्यावरणविद् डॉ.प्रकाश कोठारी के अनुसार लकड़ी जलने से तमाम खतरनाक गैसें निकलती हैं। कोहरे के साथ गैस तेजी से मिल जाती है और हल्की सी धूप निकलने पर प्रकाश के साथ रासायनिक क्रिया करके रासायनिक कुहासा बनाती है, जो सांसों के जरिये शरीर में जाकर फेफड़ों को डैमेज कर सकता है। जितनी दूर तक कोहरा छाया रहेगा, वहां तक रासायनिक कुहासा भी बनेगा। ऐसे में मेला क्षेत्र में लकड़ियों का ज्यादा उपयोग मेला क्षेत्र के साथ शहर के अन्य इलाकों में रहने वालों के लिए भी घातक साबित हो सकता है। खासतौर पर उन लोगों के लिए जो सुबह चहलकदमी के लिए निकलते हैं।
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