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न्याय व्यवस्था को चोट पहुंचा रहे ‘घुसपैठिए’: हाईकोर्ट

Allahabad

Updated Wed, 05 Dec 2012 05:30 AM IST
इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने वकालत के पेशे में घुस आए कुछ गलत लोगों द्वारा इसकी पवित्रता नष्ट किए जाने पर गहरी चिंता जताई है। कहा है कि ऐसे लोग न सिर्फ वकालत को बदनाम कर रहे हैं, बल्कि न्याय व्यवस्था को भी चोट पहुंचा रहे हैं। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो समस्या भीषण हो सकती है। दागी वकीलों की जांच कर पेशे से बाहर करने के मामले पर सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने सरकारी वकीलों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी तीखा कटाक्ष किया है। उन्होंने कहा कि यदि प्रदेश सरकार एक चतुर्थश्रेणी कर्मचारी की नियुक्ति से पूर्व उसके चरित्र और आचरण की जांच कराती है तो फिर सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए क्यों नहीं।
अदालत में उपस्थित महाधिवक्ता एसपी गुप्ता से उन्होंने जानना चाहा कि पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में सरकारी वकीलों की नियुक्ति की गई है, क्या उसमें अधिवक्ताओं को सरकार के पैनल में शामिल करने से पूर्व उनके चरित्र, गतिविधियों की जांच की जाती है। सरकार के पास नियुक्ति का क्या तरीका है। दो नवंबर 2012 को हाईकोर्ट में वकीलों की हड़ताल के दौरान राज्य सरकार के वकीलों की अदालत में अनुपस्थिति पर भी उन्होंने महाधिवक्ता से जानना चाहा कि क्या सरकार की ओर से इन अधिवक्ताओं की कोर्ट में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कोई कदम उठाया गया।
महाधिवक्ता ने इन सवालों का जवाब देने के लिए अदालत से समय मांगा है। इससे पूर्व बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश केसचिव पीएन त्यागी ने शपथपत्र दाखिल कर बताया कि वकीलों के पंजीकरण के समय ही उन पर लंबित मुकदमों की जानकारी मांगी जाती है। यदि पंजीकरण के बाद किसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता है तो उसे यह सूचना तीन माह में काउंसिल को देनी होगी। इसी प्रकार से वकालत से इतर व्यवसाय कर रहे लोगों के बारे में भी नियम है। काउंसिल की ओर से आईके चतुर्वेदी और राकेश पांडेय ने न्यायालय को अवगत कराया कि गैरपेशेवर वकीलों की रोकथाम के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक प्रस्ताव भेजा गया है। इसमें प्रावधान है कि हर पांच साल पर अधिवक्ता पंजीकरण का नवीनीकरण करा जाए। इसी प्रकार से वकीलों की हड़ताल रोकने के लिए भी प्रस्ताव पर विचार हो रहा है। याचिका पर अगली सुनवाई 15 जनवरी 2013 को होगी।
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