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‘भूमि’ के बिना ही जूना ने किया ‘पूजन’

Allahabad

Updated Thu, 29 Nov 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। इसे मुहूर्तों का मेल कहें, जूना की जिद या मेला प्रशासन की अक्षमता, बुधवार को कार्तिक पूर्णिमा पर पंचदशनाम जूना अखाड़े की ओर से औपचारिक रूप से ‘बिना भूमि, भूमि पूजन’ किया गया। कई महीनों की सूचना और चेतावनी के बावजूद मेला प्रशासन तय समय पर जूना को मेला क्षेत्र में जमीन नहीं दे सका, लिहाजा जूना और अखाड़ों की परंपरा और इतिहास में पहली बार मेला क्षेत्र नहीं जूना के मौजगिरि आश्रम परिसर में ही भूमि पूजन किया गया।
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अखाड़े के रमता पंच के श्रीमहंत पृथ्वी गिरि, सचिव प्रेमगिरि, सचिव प्रेमपुरी ने कलश स्थापना के साथ मेले की कुशलता के लिए भूमि पूजन कराया। इसके लिए तांबा, पीतल, लोहे के कलश रखे गए जिसमें क्रमश: संगम का पवित्र जल, चावल और गुड़-गेहूं भरा गया। पारंपरिक रूप से शुभता के लिए तिलक-चंदन लगाकर हाथी का भी पूजन किया गया। अभिजित मूहूर्त से पहले संगम पर जूना के तीनों प्रतिनिधियों की ओर से विधि विधान से पूजन की परंपरा पूरी की गई।
भूमि पूजन में जूना के सहयोगी अखाड़ों आवाहन और अग्नि के प्रतिनिधियों ने भी मौजूदगी दर्ज कराई गई। आश्रम परिसर में श्रीमहंत हरिगिरि की देखरेख में हु्ए कार्यक्रम में काशी सुमेरू पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती सहित जूना के सचिव विद्यानंद सरस्वती, आवाहन केसचिव महंत सत्यगिरि, महंत कैलाशपुरी, अग्नि के महंत अच्युतानंद, महंत हरिहरानंद, महंत गोविंदानंद, महंत मधुसूदन गिरि सहित बड़ी संख्या में तीनों ही अखाड़ों के पंच, महंत, संन्यासी मौजूद थे।
फिर जूना ने डाली नई परंपरा
पहले पेशवाई की तरह नगर प्रवेश और अब मेले से बाहर, आश्रम परिसर में ही भूमि पूजन करके एक बार फिर पंचदशनाम जूना अखाडे़ ने नई परंपरा डाली। हालांकि जूना के सचिव श्रीमहंत हरिगिरि ने तर्क दिया कि मेला क्षेत्र 27 किलोमीटर के दायरे तक माना जाना चाहिए, ऐसे में आश्रम परिसर में पूजन उचित है, पर पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन के मुखिया महंत दुर्गादास सहित अन्य अखाड़ों के प्रतिनिधियों ने इसे नई परंपरा करार दिया। उनके मुताबिक मेले से बाहर भूमि पूजन की अब तक कोई परंपरा नहीं रही है, ऐसे में जूना के पहल को परंपरा से इतर है।
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