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नहाय-खाय से शुरू होगी छठ पूजा

Allahabad

Updated Sat, 17 Nov 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। भगवान सूर्य की उपासना का महापर्व डाला छठ कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी शनिवार को नहाय-खाय के साथ आरंभ होगा। महिलाएं सुबह गंगा स्नान के बाद विधि विधान से व्रत रखने का संकल्प लेंगी। शाम को चने की दाल और लौकी की सब्जी का प्रसाद खाया जाएगा। शुक्रवार को महिलाएं पूरे दिन व्रत की तैयारियों में व्यस्त रहीं। घर की सफाई और शुद्धिकरण का कार्य देर रात तक चलता रहा। गंगा जल से पूरे घर को शुद्ध किया। सूप, डाला और पूजा सामग्री की खरीदारी की गई। सुख, समृद्धि और सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त करने और सूर्य देवता को प्रसन्न करने के लिए व्रतपर्व अगले चार दिनों तक चलेगा।
प्रसाद बनाने के लिए चूल्हे की लकड़ी से लेकर बर्तन तक सभी को गंगाजल से पवित्र करने का क्रम शुक्रवार को ही शुरू हो गया। व्र्रत का पकवान बनाने के लिए विशेष तौर से मिट्टी के चूल्हे बनाए गए हैं। प्रसाद इसी पर बनेगा। पूजन सामग्री तैयार करने के लिए फूल और पीतल के शुद्ध माने जाने वाले बर्तनों का प्रयोग किया जाएगा। पंडित भक्तराज पांडेय के मुताबिक दूसरे दिन पंचमी रविवार को खरना होगा जिसमें कुलदेवता की पूजा होगी। षष्टी सोमवार को निर्जला व्रत रह कर महिलाएं गंगा यमुना नदी में कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगी। सप्तमी मंगलवार की सुबह को उगते सूरज को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाएगा।
परिवार के पुरुष ही उठाते हैं डाला
ईख, नारियल पत्ते वाली हल्दी, मुसम्मी, शरीफा सहित कई तरह के फल गाजर, नीबू, कद्दू, मूली, अदरक, पुआ आदि से सजे डाला को घर से घाट तक लाने का काम परिवार के पुरुष सदस्य पति और पुत्र करते हैं। महिलाएं पारंपरिक गीत और सूर्य आराधना के गीत गाती घर से घाट तक का सफर तय करेंगी।
खरना से शुरू होगा मुख्य व्रत
सूर्य षष्टीव्रत की असली शुरूआत कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को खरना से मानी जाती है। व्रती महिला पूरे दिन निर्जल रहकर पूजा स्थल या कमरे में पूड़ी रोटी और मीठा चावल बनाएंगी। बंद कमरे में गोधूलि बेला में पूजा अर्चना के बाद प्रसाद और जल ग्रहण करेंगी। प्रसाद खाते समय किसी प्रकार का शोर न हो इसका विशेष ध्यान रखा जाता है।
मान्यता है कि सूर्य उपासना से बड़ी से बड़ी विपदा को टाला जा सकता है। ग्रह नक्षत्रम ज्योतिष संस्थान के निदेशक आशुतोष वार्ष्णेय के मुताबिक इस पर्व में सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें उगते सूर्य की पूजा से पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा जाता है। इससे कुष्ट रोग का भी निवारण होता है। महाभारत के वन पर्व में सूर्यषष्टी व्रत का उल्लेख है। साथ ही व्रत के महात्म्य के बारे में लिखा है कि सूर्य आराधना से सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र एवं सुख सौभाग्य में वृद्धि होती है। असाध्य बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
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