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यूजीसी का फरमान, फिलहाल 10 करोड़ से चलाएं काम

Allahabad

Updated Tue, 13 Nov 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन की सुस्त चाल और आपसी खींचतान के कारण भविष्य की योजनाओं पर भी ग्रहण लगता दिख रहा है। आलम यह है कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना के लिए यूजीसी ने अभी तक विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों को वार्ता के लिए भी नहीं बुलाया है। योजनाओं को पूरा करने के मामले में विश्वविद्यालय का पिछला रिकार्ड काफी खराब है। इसलिए अफसर दबाव भी नहीं बना पा रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि यूजीसी ने फिलहाल काम चलाने के लिए मात्र 10 करोड़ रुपये दिए हैं, जबकि योजना 22 अरब रुपये की बनाई गई है।
मेडिकल और इंजीनियरिंग फैकेल्टी बनाने, कालेजों को विश्वविद्यालय से ऑनलाइन जोड़ने समेत विभिन्न प्रस्ताव मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजे गए हैं लेकिन इसके बाद कोई प्रगति नहीं हुई। पहले प्रस्ताव ही चार महीने देर से भेजे गए तो अब यूजीसी में फाइल लटकी है। लेखा विभाग की ओर से इस सिलसिले में मंत्रालय तथा यूजीसी से कई बार संपर्क किया गया लेकिन इसको लेकर सार्थक वार्ता भी शुरू नहीं हो पाई है। प्रस्तावों की मंजूरी तो अभी दूर की बात है। यूजीसी ने साफ तौर पर कह दिया है कि पहले पुराना काम पूरा करो। लेखा विभाग के काफी प्रयास के बाद यूजीसी ने प्लान के तहत मात्र 10 करोड़ रुपए भेजे हैं, जो काफी कम हैं। ऐसे में इस पैसे से कुछ जरूरी काम करने का निर्णय लिया गया है। इसके मद्देनजर प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। विभागाध्यक्षों से भी प्रस्ताव मांगे गए हैं।
प्रस्तावों की स्वीकृति में होगी देरी!
बारहवीं पंचवर्षीय योजना के प्रस्तावों की मंजूरी में अभी देरी की बात कही जा रही है। यूजीसी यदि एक महीने के भीतर विश्वविद्यालय के अफसरों को इस पर चर्चा के लिए बुला ले तब भी आगे की प्रक्रिया पूरी होने में तीन से चार महीने लग जाएंगे। ऐसे में इस वित्तीय वर्ष में पैसा मिलने की उम्मीद कम है। प्रस्तावों पर चर्चा के बिना ही 10 करोड़ रुपए दिए जाने से इस आशंका को और बल मिल रहा है
यूजीसी ने मांगी रिपोर्ट
विश्वविद्यालय में पिछली पंचवर्षीय योजना में दो नए भवन के निर्माण का निर्णय लिया गया था। इनमें से एक की तो अभी तक नींव भी नहीं रखी जा सकी है। दूसरा भवन भी आधा-अधूरा ही बना है। इसे विश्वविद्यालय को हैंडओवर करने की तिथि आधा दर्जन बार टाली जा चुकी है। यही स्थिति विश्वविद्यालय के विद्युत उपकेंद्र को लेकर भी है। इसके अलावा कई अन्य योजनाएं भी पूरी नहीं हो पाईं। आलम यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन तकरीबन एक अरब रुपए खर्च ही नहीं कर सका। यूजीसी ने इसको लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब मांगा है।
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