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पॉलीथिन पर प्रतिबंध से मिलेगी गंगा को संजीवनी

Allahabad

Updated Sat, 20 Oct 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। पॉलीथिन पर पूरी तरह प्रतिबंध ने गंगा, गंगा जल पर निर्भर लोगों और प्रदूषण से परेशान शहरियों को नई संजीवनी दे दी है। बात केवल इतनी नहीं है कि अब पॉलीथिन में सब्जियां, दूध और अन्य खाद्य सामग्री घर तक नहीं आएगी, बल्कि इस पर रोक से शहर के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा बनी नाली और सीवर चोक नहीं होंगे। पिछले वर्षों में जब भी नाले और सीवर की सफाई हुई कई टन पॉलीथिन निकली। मवेशियों को कूड़े के ढेर से पॉलीथिन खाते देखना अपने आप में बेहद दुखद है जो अब रुक सकेगा। इसके कारण मिट्टी, पानी और शरीर को होने वाले नुकसान से भी राहत मिलेगी।
अकेले इलाहाबाद में प्रतिदिन 10 से 15 किलोग्राम तक पॉलीथिन गंगा-यमुना में जाती है। गंगा किनारे के रसूलाबाद, शंकरघाट, दारागंज में रामघाट एवं दश्वामेध घाट, द्रौपदी घाट तथा यमुना किनारे ककरहा घाट, बरगद घाट, गऊघाट, बलुआघाट, सरस्वती घाट आदि पर प्रतिदिन सैकड़ों लोग स्नान के लिए आते हैं। इस दौरान गंगा-यमुना की पूजा के लिए फूल माला, दूध, हवन सामग्री, रोरी, इलायची दाना भी साथ लाते हैं और यह सभी सामग्री पॉलीथिन में होती है। स्नान के बाद पूजन सामग्री निकालकर पॉलीथिन नदी में फेंक दी जाती है। स्नान पर्वों के दौरान घाटों के किनारे पॉलीथिन की मात्रा और बढ़ जाती है। लंबे समय से फेंकी जा रही पॉलीथिन बड़ी मात्रा में गंगा-यमुना के तल पर एकत्र हो रही है। कभी न गलने, सड़ने वाली इस पॉलीथिन के कारण भूगर्भ में नदियों का पानी पहुंचने में अड़चन आ रही है।
पॉलीथिन का इस्तेमाल हर तरह से खतरनाक है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी डॉ.मोहम्मद सिकंदर के मुताबिक लंबे समय से जमीन के नीचे दबे रहने के बाद पॉलीथिन के सड़ने पर इससे बेहद जहरीली गैस निकलती है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम होती है। लगातार किसी जमीन में पालीथिन डंप की जाए तो जल्द ही पूरी जमीन खराब हो जाती है। इससे फसल भी खराब होती है। इसके अलावा इसे जलाने से फ्यूरोन्स और डाइऑक्सेन जैसी खतरनाक गैसें निकलती हैं जो शरीर को काफी नुकसान पहुंचाती हैं।
सड़क, गलियों में कूड़े के ढेर में पड़ी पॉलीथिन जानवरों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। पॉलीथिन को जानवर खाते हैं जो उनकी आंतों में चिपक जाती है। इससे धीर-धीरे उनकी भूख कम होने के साथ दूध देने की क्षमता भी घटती जाती है। कुछ समय बाद जानवर की मौत हो जाती है। पशु चिकित्सक डॉ.धीरज गोयल के मुताबिक जानवरों के पेट से पॉलीथिन निकालने का एकमात्र इलाज उसका ऑपरेशन हैं लेकिन यह इतना खतरनाक है कि ऑपरेशन करना संभव नहीं होता। हर साल केवल इसी कारण सैकड़ों जानवरों की जान चली जाती है।
पॉलीथिन का विकल्प जूट के थैले और कागज की थैलियां हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ.मुकेश शर्मा के मुताबिक इसके अलावा पॉलीथिन के आधुनिक विकल्प के रूप में रियोइथेन इमरसन से बने थैले भी हैं जो बहुत जल्द गल जाते हैं और इससे किसी तरह का नुकसान भी नहीं है।
पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाने का आदेश लंबे समय से दिया जा रहा है। इसके लिए नगर निगम के पर्यावरण विभाग को जिम्मेदारी भी दी गई है। पिछले वर्ष की शुरूआत में नगर निगम ने चार-छह अभियान चलाए। गंगा किनारे के बाजारों तेलियरगंज, फाफामऊ, दारागंज में अभियान के दौरान निगम अफसरों की व्यापारियों से झड़प भी हुई। उस दौरान तकरीबन 50 किलो पॉलीथिन जब्त की गई और जुर्माना भी वसूला गया। इसके बाद अभियान बंद हो गया। कार्रवाई करने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार पर्यावरण अभियंता अभियान में कभी शामिल नहीं हुए। इसके अलावा जब भी अभियान चलाने की बारी आई तो कभी वाहन की कमी तो कभी पुलिस फोर्स न होने के कारण अड़ंगा लग गया। तकरीबन दो माह पहले तत्कालीन नगर आयुक्त पीएन दुबे ने सफाई इंस्पेक्टरों को अभियान में शामिल होने और रसीद काट कर जुर्माना वसूलने का निर्देश दिया। इस पर कार्रवाई होती, इसके पहले उनका तबादला हो गया और कार्रवाई शुरू होने के पहले ही बंद हो गई।
नगर निगम ने कुछ संस्थाओं के साथ मिलकर अक्तूबर में अब तक आधा दर्जन जागरूकता अभियान चलाया। त्रिवेणी बांध पर हनुमान मंदिर से दारागंज तक दुकानदारों को पॉलीथिन के खतरे से अवगत कराया और ग्राहकों को उसमें सामान न देने की अपील की लेकिन सख्ती न होने के कारण इसका कोई असर नहीं है।
नगर निगम ने जब भी पॉलीथिन के प्रति अभियान चलाया तो सिर्फ संगम क्षेत्र में। पिछले दिनों निगम ने कई संस्थाओं के साथ मिलकर लगातार दो दिनों तक संगम तक सफाई अभियान चलाया। अभियान में तकरीबन 10 ट्रक कचरा एकत्र किया, जिसमें पॉलीथिन की मात्रा सबसे ज्यादा थी। इसके अलावा कई सामाजिक संस्थाओं की ओर से भी अन्य घाटों को छोड़कर सिर्फ संगम और किला घाट पर पॉलीथिन के खिलाफ अभियान चलाया जाता है।

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