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महिला अधिकारों के लिए कड़े कानूनों की जरूरत: जस्टिस चौहान

Allahabad

Updated Sun, 07 Oct 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश डा. बीएस चौहान ने कहा कि महिलाओं को लेकर हमारे कानून में अभी भी बहुत सी विसंगतियां हैं। उनको बराबरी का दर्जा देने के लिए कई क्षेत्रों में कानून बनाने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार को लेकर कई दिशा निर्देश जारी किए हैं, मगर उन पर अब तक कोई कानून नहीं बनाया गया। न्यायामूर्ति चौहान ने उत्तराधिकार, सेरोगेसी, लिव-इन रिलेशनशिप जैसी कई सामाजिक विसंगतियों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश में यह आनेवाले दिनों की बड़ी चुनौतियां हैं जिनका सामना न्यायपालिका और वकीलों को भी करना होगा। न्यायमूर्ति चौहान इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विधि विभाग और एआईआर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में मुख्य अतिथि के तौर पर बोल रहे थे। उन्होंने प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं को काफी ऊंचा दर्जा दिया गया है। दूसरी ओर हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां महिला को खरीदने-बेचने की वस्तु भी समझा जाता है। राजस्थान में बहुविवाह की प्रथा का भी उन्होंने जिक्र किया। जस्टिस चौधरी ने कहा कि महिलाओें की सामाजिक स्थिति दुनिया के किसी भी देश में अच्छी नहीं रही है।
न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने महिलाओं के प्रति असमानता को समाप्त करने के लिए शिक्षा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमारा संविधान किसी प्रकार का लिंगभेद नहीं करता। महिलाओं के सम्मान को न्याय और कानून की मदद से सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके लिए शिक्षा का प्रसार आवश्यक है। प्रो. ए लक्ष्मीपति ने न्यायिक प्रक्रिया की स्थिति की चर्चा की। प्रख्यात कानूनविद् पीपी राव ने महिलाओं की स्थिति और उनके लिए बने कानूनों को लेकर कई ज्वलंत सवाल खड़े किए। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एके सिंह ने एक व्यवस्थित कानूनी ढांचे की वकालत की जो महिलाओं की समस्याओं के निरंतर समाधान में कारगर हो। इससे पूर्व आल इंडिया रिपोर्टर (एआईआर) के प्रबंध निदेशक सुमंत चितले ने एआईआर के विधि क्षेत्र में योगदान की चर्चा की। प्रो. राकेश खन्ना ने सेमिनार का परिचय दिया। विधि विभाग के डीन प्रो. एलएम सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. बीपी सिंह ने किया। कार्यक्रम में हाईकोर्ट के तमाम न्यायमूर्तिगण और वरिष्ठ अधिवक्ता भी उपस्थित थे।
कन्यादान ही क्यों पुत्रदान क्यों नहीं
सेमिनार के दौरान जस्टिस चौहान ने चुटकी लेते हुए कहा कि हमारे यहां मनुस्मृति और अन्य ग्रंथों में कन्यादान की परंपरा है। इसका तो यह अर्थ है कि बेटी पिता की संपत्ति होती है, मगर पुत्रदान की परंपरा नहीं है।
सेरोगेसी का सबसे बड़ा हब बन सकता है देश
भारत चीन के बाद सेरोगेसी का सबसे बड़ा हब बन सकता है। जस्टिस चौहान ने चेताया कि दुनिया के तमाम देश जहां सेरोगेसी को जहां प्रतिबंधित कर चुके हैं वहीं भारत और चीन में इससे संबंधित अभी तक कोई कानून मौजूद नहीं है। आने वाले समय में यह बड़ी चुनौती बन सकता है।
सेमिनार में यह रहे प्रमुख मुद्दे
महिला उत्तराधिकार से संबंधित कानून में संशोधन होना चाहिए
सेरोगेट मदर, स्पर्म डोनेशन, लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों पर कानून बनने चाहिए
भविष्य में उठने वाले कानूनी विवादों से बचने के लिए महिलाओं की निजता को लेकर भी कानून बने
विशाखा केस और अन्य मामलों सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए निर्देशों पर कानून बनना चाहिए
कानूनों को असरदार तरीके से लागू करने की व्यवस्था होनी चाहिए
महिलाओं को राजनीतिक और सामाजिक तौर पर और अधिकार देने व्यवस्था होनी चाहिए
स्त्री शिक्षा पर जोर दिया जाए, शिक्षा ही विषमता दूर कर सकती है।
संवैधानिक प्रावधानों का आम लोगों के बीच भी समान रूप से पालन होना चाहिए
लिंगानुपात को बनाए रखने के लिए इसका संरक्षण किया जाना जरूरी है।
विवाह संबंधी निर्णय में महिलाओं को और स्वतंत्रता मिले, ऑनर किलिंग पर सख्त कानून बने
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