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आईपीएल की तर्ज पर एसीएल ने खोला लूट का मैदान

Allahabad

Updated Mon, 24 Sep 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। शहर में क्रिकेट भले ही दम तोड़ रहा हो, लेकिन इलाहाबाद क्रिकेट एसोसिएशन (एसीए) मालामाल हो गया है। एसीए की तरफ से हो रहे इलाहाबाद क्रिकेट लीग (एसीएल) के नाम पर टीमों से लाखों रुपए वसूलने के बाद भी पिछले साल सीरिज का फाइनल नहीं कराया गया। इसके अलावा 2010-11 में जो फाइनल हुआ, उसका इनाम हजम कर लिया गया। मोटी रकम वसूलने के बाद जो लीग मैच कराए जा रहे हैं, उनमें खिलाड़ियों को पानी तक नहीं मिलता। यहां तक कि बॉल भी खिलाड़ी ही खरीदकर लाते हैं। ग्राउंड चार्ज के नाम पर भी हेरफेर किया जा रहा है। यही वजह है कि शहर की कई बड़ी टीमें इस बार लीग नहीं खेलने पर विचार कर रही हैं।
एसीए क्रिकेट लीग में पिछले साल करीब 58 टीमों ने भाग लिया था। एमआर शेरवानी लीग में 29, डॉ.रवि वर्मा लीग में 15 और मनीष देव लीग में 14 टीमों ने हिस्सा लिया था। एमआर शेरवानी और डॉ.रवि वर्मा लीग खेलने वाली टीमों से इंट्री फीस के नाम पर दस-दस हजार रुपए वसूले गए थे। इसके अलावा रजिस्ट्रेशन के नाम पर हर खिलाड़ी से 100-100 रुपए लिए गए थे। हर टीम में कम से कम 15 खिलाड़ी होते हैं। ऐसे में टीमों को कुल 11 हजार 500 रुपए अदा करने के बाद लीग में खेलने का मौका मिला। अलबत्ता जिस क्लब के पास अपने ग्राउंड थे, उनसे 7800 रुपये लिए गए। इसमें भी हेरफेर किया गया। एक मैदान पर दो टीमों के मैच कराने के बाद एसीए ने ग्राउंड चार्ज के नाम पर सिर्फ 300 रुपए ही अदा किए। यानी एसीए को हर मैच में अलग से फायदा हुआ। कुछ ग्राउंड ऐसे हैं, जहां मैच कराने के लिए एसीए को 50 रुपए भी खर्च नहीं करने पड़े। एसीए के क्वार्डिनेटर और पूर्व रणजी खिलाड़ी आरपी भटनागर ने इंट्री फीस के मसले पर बात करने से इंकार कर दिया। उनका कहना है कि उन्हें लीग से जुड़े खिलाड़ियों की मानें तो एसीए को हर साल लाखों रुपए का मुनाफा होता है। एक दर्जन टीमें ही हैं, जिनके पास अपने ग्राउंड हैं। करीब 35 टीमें हैं, जिन्हें पूरी इंट्री फीस अदा करनी पड़ी। सूत्रों के मुताबिक जिनके नाम से लीग कराए जा रहे हैं, उन्हीं के घर वाले प्राइज का खर्च भी उठाते हैं। इसके अलावा एसीए की तरफ से खिलाड़ियों को न तो मैन ऑफ द मैच और न ही मैन ऑफ द सीरीज के पुरस्कार दिए जाते हैं। बॉल और लंच का इंतजाम भी नहीं कराया जाता। इसका खर्च भी टीमों को ही उठाना पड़ रहा है। ऐसे में 60-70 हजार रुपए खर्च करने के बाद एसीए को हर साल लाखों रुपए बच रहे हैं। बचे हुए पैसे कहां खर्च हो रहे हैं, इस पर गोलमोल जवाब दिए जा रहे हैं। एसीए के असिस्टेंट ज्वाइंट कनवेनर सोमेश्वर पांडेय कहते हैं कि अंपायर, स्कोरर और ग्राउंड चार्ज देने के बाद एसीए को इतना पैसा नहीं बचता।
इलाहाबाद में लीग के नाम पर भले ही लूट मची हो लेकिन लखनऊ और कानपुर में ऐसा नहीं है। लखनऊ एसोएिशन से जुड़े और राज्य स्तरीय स्कोरर विकास पांडेय के मुताबिक यहां इंट्री फीस के नाम पर सिर्फ चार हजार रुपए लिए जा रहे हैं। यही हाल कानुपर का है। इसके बाद टीमों से किसी तरह के कोई चार्ज नहीं लिए जाते। इसके बदले एसोसिएशन टीमों को हर मैच में 1200 रुपए कीमत की एसजी बॉल और लंच प्रदान करता है। एसीए रजिस्ट्रेशन के लिए खिलाड़ियों से 100 रुपए लेता है, जबकि कई जगहों पर पांच रुपये देने के बाद खिलाड़ी रजिस्टर्ड हो जाते हैं।
एसीए के रिसीवर डा.सुनील वर्मा का दावा है पिछले साल का फाइनल अक्तूबर में कराया जाएगा। इसके साथ ही 2010-11 में फाइनल खेल चुकी टीमों को प्राइज भी बांटी जाएगी। उनका कहना है कि इस बार एमआईसी और चौधरी नौनिहाल एकेडमी के बीच खेले गए सेमीफाइनल मैच में खिलाड़ियों और अंपायरों के बीच विवाद हो गया था, जिसकी वजह से फाइनल नहीं कराया जा सका।
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