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कैसे मिलेगी पितरों को शांति

Allahabad

Updated Sun, 23 Sep 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। पितृपक्ष में पितरों के निमित्त पहला ग्रास कौओं को दिया जाता है, ऐसी परंपरा है पर संगम की रेती सहित संगम नगरी में तेजी से कम हो रही कौओं की संख्या से इस परंपरा पर ही संकट है। तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध के बाद पितरों के नाम से निकाले गए ग्रास को लेने कौए नहीं आए तो पितरों को शांति कैसे मिलेगी। संगम की रेती से गुम हो रहे कौओं ने तीर्थ पुरोहितों सहित परिवारीजनों की चिंता बढ़ा दी है। पहले तो संगम क्षेत्र में कौए दिख भी जाते थे, पर बीते कई वर्षों से उनकी संख्या में लगातार तेजी से कमी आई है। ऐसे में संगम क्षेत्र में अपने पितरों के लिए पिंडदान कराने आए लोगों को कौओं की प्रतीक्षा करनी होगी। मन में एक सवाल तो बना ही रहेगा कि पितरों को शांति कैसे मिलेगी।
वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित जगन्नाथ शास्त्री ने बताया कि पितृपक्ष में पहला ग्रास कौओं को देने का विधान है लेकिन उनके न मिलने पर उनका ग्रास गाय या कुत्ते को खिला दिया जाता है। वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित सालिक राम पांडेय के मुताबिक कौओं के निमित्त ग्रास निकालकर छप्पर पर रख दिया जाता है। शाम तक कोई कौआ नहीं आता तो वह ग्रास गौ को खिला दिया जाता है। वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित विष्णु पुरोहा बदलाव से दुखी हैं। कहा कि कई दिनों के बीच इक्का-दुक्का कौए मुश्किल से दिखाई देते हैं। दो-एक वहीं दिखते हैं, जहां उन्हें दाना देकर आने का अभ्यास कराया जाता है।
जीव वैज्ञानिक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संदीप कुमार मल्होत्रा मानते हैं कि भोजन और प्रजनन के संकट ने कौओं की संख्या में कमी की है। कौओं का मुख्य भोजन कीड़े-मकौड़े होते हैं, जो नदियों की सतह पर मिलते हैं, पर संगम के हाइड्रोग्राफिक परिवर्तन यानी जलस्तर में लगातार कमी और कटान के कारण कीड़े-मकोड़े नहीं मिल रहे। इसी तरह तापमान में अप्रत्याशित परिवर्तन सहित तेजी से वृक्षों की कटान से प्रजनन को सुरक्षित ठौर नहीं मिल पा रहा है। इससे उनके प्रजनन में कमी आई है। अनुकूल भोजन और प्रजनन को अनुकूल परिस्थिति न मिलने से कौए गुम हो रहे हैं।
‘परंपरानुसार पितरों के निमित्त निकाले जाने वाले तीन अंशो में से पहला भाग कौओं को मिलना चाहिए। माना जाता है कि इनके माध्यम से पितृ शृंखला बनती है। इनके द्वारा ग्रास स्वीकार करने से श्राद्धकर्म पूर्ण होता है।’
पंडित पद्म नारायण शोकहा
वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित, शीशा-झबिया निशान
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