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शस्त्र लाइसेंस को जरूरी नहीं जीवन पर खतरा

Allahabad

Updated Fri, 24 Aug 2012 12:00 PM IST
0 संविधान देता है हर नागरिक को जीवन की रक्षा का अधिकार
0 शस्त्र लाइसेंस का आवेदन खारिज करने पर राज्य सरकार पर दो लाख रुपये का हर्जाना
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने शस्त्र लाइसेंस पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति पर आसन्न खतरा साबित न होने के आधार पर उसका आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता है। शस्त्र प्राप्त करना भले ही व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं है, पर यह प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता की रक्षा करने जैसा ही अधिकार है। प्रदेश सरकार और लाइसेंस अधिकारी को यह अधिकार प्राप्त है किस व्यक्ति को शस्त्र का लाइसेंस दे और किसे नहीं। परंतु उसका यह अधिकार अनियंत्रित नहीं हो सकता है। यह कानून के द्वारा नियंत्रित है। देवरिया जिले के दिनेश कुमार पांडेय और राजेश पांडेय की याचिकाओें का निस्तारण करते हुए न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने यह निर्णय दिया।
जिलाधिकारी देवरिया ने दोनों याचियों का शस्त्र लाइसेंस का आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया था कि उन्होंने अपने आवेदन में खुद पर या परिवार पर किसी आसन्न खतरे का जिक्र नहीं किया था। कमिश्नर गोरखपुर ने भी उनकी अपील इसी आधार पर खारिज कर दी। कोर्ट ने दोनों अधिकारियों को तलब किया था। प्रदेश सरकार की ओर से कहा गया कि अधिकारियोें ने केंद्र सरकार के 20 मार्च 2009, 31 मार्च 2010 और प्रदेश सरकार के तीन जून 1998 तथा पांच जून 1999 के शासनादेशों के आधार पर आवेदन रद किया है। इन शासनादेशों में कहा गया है कि शस्त्र लाइसेंस उसी व्यक्ति को दिए जाएं जिनको वास्तव में इसकी आवश्यकता है। मात्र व्यक्तिगत सुरक्षा और संरक्षा के आधार पर लाइसेंस नहीं दिया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि हर वह बात जो व्यक्ति को प्रसन्न, स्वस्थ्य, सम्मानित और जीने योग्य बनाती है, जीवन जीने के मौलिक अधिकार में शामिल है। इसमें व्यक्ति को अपना जीवन सुरक्षित रखने का अधिकार भी निहित है। यदि जीवन ही सुरक्षित नहीं होगा तो जीवन जीने के मौलिक अधिकार का औचित्य समाप्त हो जाएगा। कोर्ट ने डीएम देवरिया और कमिश्नर गोरखपुर के आदेश को रद करते हुए याचियों के आवेदन पर पुन: विचार करने और बिना उचित कारण के आवेदन को 12 वर्षों तक निस्तारित न किए जाने पर दो लाख रुपये का हर्जाना लगाया है।
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